भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 633

चित्रदीप का संक्षेप ४५


स्वयमेव छूट जाता है । इस तत्व का ज्ञान होने पर भी यदि भूख प्यास से इस तत्व को चोट लगती हो, यह तत्व, भाग जाने को या ओझल हो जाने को तय्यार होता हो, तो भूख प्यास जिस अहंकार को लगी है उसी में रहने दो । दूसरे के धर्मों को अपने में मत लादो । ये भूख प्यास तादात्म्य कर लेने से ही आत्मा को लगती है। उस अध्यास को हटाकर विवेक की आवृत्तियें सदा करनी चाहिये । क्योंकि अध्यास रूपी शत्रु के हमलों को विवेक की ढाल से ही रोका जा सकता है । चिदात्मा को अलग रक्खा जाय और अहंकार को पृथक् जाना जाय तो अब आप आजाद होकर करोड़ों पदार्थों की इच्छा कीजिये, ग्रन्थि भेद हो चुकने से अब आपको बाधा नहीं होगी । ग्रन्थि भेद हो चुकने पर भी प्रारब्ध के दोष से इच्छायें हो ही सकती हैं । इच्छाओं से घबराने की ज़रूरत नहीं है । देह में व्याधि हों, वृक्ष आदि पैदा हो या सूखे, अहंकार में इच्छा हो तो इससे चेतन आत्मा का क्या बिगाड़ होता है ? आत्म तत्व का बिगाड़ वैसे तो ग्रन्थिभेद से पहले कुछ भी नहीं होता था यह बात अगर समझ में आती है तो इसी को 'ग्रन्थि-भेद' होना कहते हैं । परन्तु अज्ञानी पुरुष इस बात को समझते नहीं हैं, यही तो एक 'ग्रन्थि' है । अज्ञानी और ज्ञानी में इस 'ग्रन्थि' के होने और न होने का ही भेद है । वैसे देखने में-व्यवहार में-तो दोनों एक ही से होते हैं । ग्रन्थि के टूटने की पहचान गीता में यों कही है कि आये हुए दुःखों से द्वेष नहीं करता तथा जाने वाले सुखों से 'और ठहरो' नहीं कहता । किन्तु उदासीन की तरह से काम करता है । अर्थात् अंदर से त्याग और बाहर से संग रख कर काम में लगा रहता है। जो लोग काम करना छोड़ देने को ही

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 633, कुल 726 में से · BharatKosha