भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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४४ पंचदशी

इससे टूटता नहीं है। इस संकल्प को धारण किये हुए इसे अनन्त सृष्टियाँ बीत चुकी हैं। इसकी बद्धपन की कल्पना दृढ- मूल हो गयी है। यह समझने लगा है कि मैं तो बद्धप्राणी हूँ। मुझे जन्म-मरण स्वभाव से मिलना ही है, कर्मों का फल मुझे भोगना ही है, मेरा गर्भवास टलना नहीं है, जन्ममरण के चक्र से मेरा छुटकारा कभी भी नहीं होना है, बस इसी तरह के विचार ही तो बन्धन कहाते हैं। बद्धता की प्रतीति के सिवाय और तो कुछ बन्धन है ही नहीं। रेशम का कीड़ा जैसे अपने आपको बांधकर मौत को नौता दे लेता है—अपने हाथ से अपनी क़बर तय्यार कर लेता है, इसी प्रकार अपने को बद्ध मानकर—स्वयं स्वीकृतअपराधी (इक़रारी मुजरिम) होकर अपने आप अपनी मरज़ी से बद्ध हुआ फिरता है और जन्म-जरा-मरण आदि की चौपाल बन रहा है। अद्वैत तत्व का प्रत्यक्ष जब तक नहीं होता, तब तक बद्धपन नष्ट नहीं होता। अद्वैत के प्रत्यक्षपन की बात समझ न पड़ती हो तो यों समझो कि ज्ञानरूप से वह अद्वैत तत्व सभी को प्रत्यक्ष है। द्युलोक, पृथ्वीलोक तथा पाताल लोक सभी को इस ज्ञान ने अपने पेट में रख छोड़ा है। कोई भी देश और काल ऐसा नहीं है जो ज्ञानसमुद्र में डूबा न पड़ा हो। यों स्थालीपुलाक न्याय से थोड़े अद्वैत को समझ कर परिपूर्ण अद्वैत को समझ लेना चाहिये। कार्य और कारण के एक होने की युक्ति से तथा तंजलान् (उसी से उत्पन्न उसी में जीवन तथा उसी में प्रलय) इस न्याय से अद्वैत तत्व का विचार करते रहना चाहिए और मायामय द्वैत जब जब आये तब तब विचार से उसे हटाते रहना चाहिये। जैसे फल पक कर डण्ठल को छोड़ देता है इसी प्रकार साक्षात्कार में जब पूर्णता आती है तब यह विचार