पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 631, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीप का संक्षेप ४३
तत्व है उसको लोग जानते ही नहीं हैं। इस अद्वितीय ब्रह्मतत्व को बिना जाने मुक्ति या लौकिक सुख कुछ भी पूरा पूरा प्राप्त नहीं हो सकता। इस लिये मुमुक्षु सदा ही ब्रह्मतत्व का विचार किया करें। यह ब्रह्मतत्व जैसा सृष्टि से पहले था, जैसा इस सृष्टि के नष्ट हो जाने पर रहेगा, वैसा ही अब भी है और मुक्ति में भी यह ऐसा ही रहेगा। यह जितना भी कुछ निरोध, उत्पत्ति, बद्धता साधकभाव आदि बखेड़ा हो रहा है यह सब इस ब्रह्म- समुद्र की केवल ऊपर की सतह पर ही हो रहा है। इसके एकान्त अन्तरतम तक इस किसी भी खटपट की कोई सूचना नहीं पहुँच पाती है। यह तत्व तो शिवलिंग की भाँति शान्त भाव से कभी भी न टूटने वाली मौनमुद्रा में बैठा हुआ है। परन्तु माया ने लोगों को वृथा ही भरमा रक्खा है। वे समझते हैं कि अद्वैत नाम की वस्तु न तो है ही और न वह प्रतीत ही होती है। ज्ञानी का निश्चय इसके विपरीत होता है। एक तो अपने निश्चय से बद्ध है दूसरा अपने ही निश्चय से मुक्त हो जाता है। बद्ध प्राणी रेशम के कीड़े की तरह अपने आपही बंधा पड़ा है। गधे और खच्चर वालों के पास जब उनको बांधने की बेड़ नहीं होती, तब वे उनके पैरों को बांध देने का नाटक करके उनके पैरों को चारों तरफ़ से स्पर्श कर देते हैं। हैं। गधे और खच्चर समझते हैं कि हम बांध दिये गये हैं। वे रात भर अपने उस संकल्प से बंधे खड़े रहते हैं। इसी तरह यह प्राणी अपने ही संकल्पों से अनादि काल से वृथा ही बंधा पड़ा है। जैसे लकड़ी में छेद कर देने वाले भौंरे से कमल का कोमल फूल तक नहीं कटता, इसी प्रकार प्राणी का यह अपने ही संकल्प का बन्धन बड़ा ही दुर्भेद्य हो गया है। यह अब