पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
9. Dhyanadipa
ॐ ध्यानदीपप्रकरणम् संवादिभ्रमवद् ब्रह्मतत्त्वोपास्त्यापि मुच्यते । उत्तरे तापनीयेऽतः श्रुतोपास्तिरनेकधा ॥१॥ जो मनुष्य संवादिभ्रम में आकर किसी कार्य में प्रवृत्त होता है, जैसे उसे उसकी अभिप्रेत वस्तु मिल ही जाती है, उसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना करने से भी मोक्ष मिल जाता है [यद्यपि यह मोक्ष का सीधा रास्ता नहीं है] इसी कारण तापनीय उपनिषत् में अनेक प्रकार से ब्रह्मतत्व की उपासनायें सुनी गयी हैं। जिन लोगों ने उपनिषदों का श्रवण कर लिया हो और बुद्धि की मन्दता आदि किसी प्रतिबन्ध से वाक्यार्थ का प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न न होता हो, उसके लाभ के लिए, अपरोक्षज्ञान को पैदा कर के मोक्ष दिलाने वाली उपासनाओं का विधान, इस प्रकरण में किया है । मणिप्रदीपप्रभयो र्मणिबुद्ध्याभिधावतोः । मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोऽर्थक्रियां प्रति ॥२॥ जो मणि की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ता है और जो दीपक की प्रभा को मणि समझ कर उसे उठाने दौड़ पड़ा है, यद्यपि उन दोनों ही को मिथ्याज्ञान तो समान ही है, तो भी प्रयोजनसिद्धि में विषमता [फ़र्क] पायी जाती है।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७
ध्यानदीपप्रकरणम् ३५७ मणिप्रभा को मणि समझ कर उठाने दौड़ा है, उस का काम सिद्ध होजाता है—उसको मणि मिल जाती है । दूसरे को मणि नहीं मिलती । प्रयोजनसिद्धि में यह विषमता पायी जाती है।] दीपोऽपवरकस्यान्तर्वर्तते तत्प्रभा बहिः । दृश्यते द्वार्यथान्यत्र तद्वद् दृष्टा मणिप्रभा ॥३॥ किसी एक मकान में कोई दीपक रक्खा है उसकी प्रभा किसी तंग झरोके में को निकल कर बाहर रत्न सी दीखती है । किसी दूसरे मकान में कोई रत्न रक्खा है, उसकी प्रभा भी किसी झरोके में को होकर बाहर रत्न सी ही दीखती है । दूरे प्रभाद्वयं दृष्ट्वा मणिबुद्ध्याभिधावतोः । प्रभायां मणिबुद्धिस्तु मिथ्याज्ञानं द्वयोरपि ॥४॥ वैसी दो प्रभाओं को दूर से देखकर ‘यह मणि है’ ‘यह मणि है’ यह समझ कर दो पुरुष उठाने दौड़ते हैं। उन दोनों ने जो कि प्रभा को मणि समझा है उन दोनों की ही समझ भ्रम है। न लभ्यते मणि र्दीपप्रभां प्रत्यभिधावता । प्रभायां धावतावश्यं लभ्येतैव मणिर्मणेः ॥५॥ यद्यपि दीपक की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ने वाले पुरुष को मणि नहीं मिलती, परन्तु मणि की प्रभा को मणि समझ कर दौड़ने वाला तो मणि को पा ही लेता है । दीपप्रभामणिभ्रान्ति र्विसंवादिभ्रमः स्मृतः । मणिप्रभामणिभ्रान्तिः संवादिभ्रम उच्यते ॥६॥ दीपक की प्रभा में जो मणि की भ्रान्ति है, उसे ‘विसं- वादिभ्रम’ किंवा ‘विफलभ्रम’ कहा गया है [ क्योंकि उससे मणि का लाभ नहीं होता ] जो तो मणि की प्रभा में मणि
३५८ पञ्चदशी
की भ्रान्ति है, उसको 'संवादिभ्रम' किंवा 'सफलभ्रम' कहते हैं [क्योंकि उस भ्रमसे मणि का लाभ हो ही जाता है] बाष्पं धूमतया बुद्ध्वा तत्राङ्गारानुमानतः । वह्निर्यदृच्छया लब्धः स संवादिभ्रमो मतः ॥७॥ किसी ने किसी देशमें वाष्प [भाप] को देखा उसे धूम समझ कर उस देश में अंगारों का अनुमान किया और वहां से अग्नि को लेने चल पड़ा। अब यदि दैवगति से उसे वहां अग्नि मिलजाय तो उसका वाष्प को धूम समझना 'सफलभ्रम' माना गया है। गोदावर्युदके गङ्गोदकं मत्वा विशुद्धये । संप्रोक्ष्य शुद्धि माप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥८॥ गोदावरी और गंगा का जल दोनों ही शुद्धि कारक माने जाते हैं। जो तो गोदावरी के जल को गंगा जल समझ कर उससे शुद्ध होने के लिये प्रोक्षण करता है, वह भी शुद्ध हो जाता है। गोदावरी के जल को गंगाजल समझना भ्रम तो है, परन्तु इसे 'संवादिभ्रम' कहते हैं। ज्वरेणार्त्तः सन्निपातं भ्रान्त्या नारायणं स्मरन् । मृतः स्वर्गमवाप्नोति स संवादिभ्रमो मतः ॥९॥ ज्वर से जिसे सन्निपात होगया हो, सन्निपात के पागल- पन में यदि वह नारायण का स्मरण भ्रम से भी करने लगे, तो वह मर कर स्वर्ग को जाता है। यह भी संवादिभ्रम ही है। प्रत्यक्षस्यानुमानस्य तथा शास्त्रस्य गोचरे। उक्तन्यायेन सवादिभ्रमाः सन्ति हि कोटिशः ॥१०॥
ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९ प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्रों में उक्त प्रकार के अनन्त 'संवादिभ्रम' पाये जाते हैं । अन्यथा मृत्तिकादारुशिलाः स्युर्देवताः कथम् । अग्नित्वादिधियोपास्याः कथं वा योषिदादयः ॥११॥ यदि संवादिभ्रम कोई चीज़ न हो तो, मिट्टी लकड़ी और पत्थर की प्रतिमायें देवता कैसे हो जांय ? ये तो संवादिभ्रम को मान करही फलसिद्धि के लिये देवता भाव से पूजी जाती हैं। यदि संवादिभ्रम न हो तो स्त्री आदि को अग्नि आदि समझकर उपासना का विधान क्यों किया जाय ? 'मनोब्रह्मे- त्युपासीत (छा० ३-१८-१) आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छा० ३-१९-१) इत्यादि की भी यही गति है। ये भी सब संवादिभ्रम ही हैं] अयथावस्तुविज्ञानात् फलं लभ्यत ईप्सितम् । काकतालीयतः सोऽयं संवादिभ्रम उच्यते ॥१२॥ वस्तु को उलटा समझ कर भी जब किसी को काक- तालीयन्याय किंवा दैवगति से अभिलषित फल मिल जाता है तब यही 'संवादिभ्रम' कहाता है । स्वयंभ्रमोपि संवादी यथा सम्यक् फलप्रदः । ब्रह्मतत्त्वोपासनापि तथा मुक्तिफलप्रदा ॥१३॥ संवादी भ्रम यद्यपि स्वयं भ्रम ही है, तौ भी जैसे वह ठीक फलदायी हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना भी यद्यपि अयथावस्तुविषयक ( यथार्थ वस्तु को विषय न करने वाली किंवा यथार्थ वस्तु तक न पहुँचनेवाली ) होती है तौ भी मुक्तिरूपी फल को तो दे ही जाती है ।
१६० पञ्चदशी
वेदान्तेभ्यो ब्रह्मतत्व मखण्डैकरसात्मकम् ।
परोक्षमवगम्यैतदहमस्मीत्युपासते ॥१४॥
वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एकरसात्मक ब्रह्मतत्व को परोक्ष
रूप से जब जान लेते हैं तब उसके बाद उस ब्रह्म को 'अहं
ब्रह्मास्मि' (बृ० १-३-१०) मैं ब्रह्म हूँ इस रूप में उपासना करने
लगते हैं। [शास्त्र से परोक्ष रूप से जान लिया हुआ ब्रह्म उपा-
सना का विषय होता है।]
प्रत्यग्व्यक्तिमनुल्लिख्य शास्त्राद् विष्ण्वादिमूर्तिवत् ।
अस्ति ब्रह्मेति सामान्यज्ञानमत्र परोक्षधीः ॥१५॥
विष्णु आदि की मूर्ति को बताने वाले शास्त्र के कहने से
जैसे मूर्ति का परोक्ष ज्ञान हो जाता है, उसी तरह प्रत्यक्षरूप से
आत्मा को विषय न भी करके जब वेदान्त के कहने से केवल
इतना सामान्य ज्ञान हो जाता है कि 'ब्रह्म है' तब यही ज्ञान इस
उपासना में 'परोक्षज्ञान' कहाता है।
चतुर्भुजाद्यवगतावपि मूर्ति मनुल्लिखन् ।
अक्षैः परोक्षज्ञान्येव न तदा विष्णुमीक्षते ॥१६॥
शास्त्र से तो विष्णु को चतुर्भुज आदि जान लिया जाता है,
परन्तु भावना के प्रताप से जब तक वह मूर्ति इन्द्रियों से दीख
नहीं पड़ती, तब तक पुरुष परोक्ष ज्ञानी ही रहता है। क्योंकि
उपासना के समय वह साधक अपने उपास्य विष्णु को नहीं
देखता।
परोक्षत्वापराधेन भवेन्नातत्त्ववेदनम् ।
प्रमाणेनैव शास्त्रेण सत्वमूर्तेर्विभासनात् ॥१७॥
परोक्षता रूपी कमी से ही कोई ज्ञान मिथ्याज्ञान नहीं हो
जाता है [मिथ्याज्ञान तो वह तभी होता है जब कि उस ज्ञान का विषय असत्य हो] यहाँ तो प्रमाण भूत शास्त्र के द्वारा ही विष्णु आदि की मूर्ति का ज्ञान हमें मिलता है [फिर उसे अतत्वज्ञान कैसे कह दें ?] सच्चिदानन्दरूपस्य शास्त्राद् भानेऽप्यनुल्लिखन्। प्रत्यञ्चं साक्षिणं तत्तु ब्रह्म साक्षान्न वीक्षते ॥१८॥ शास्त्र से सच्चिदानन्द रूप ब्रह्म का भान हो जाने पर भी, जब तक कोई उस ब्रह्म को प्रत्यगात्मरूप से [साक्षिरूप से] नहीं जान लेता है, तबतक कहा जाता है कि वह ब्रह्म को साक्षात् नहीं देख रहा है । शास्त्रोक्तेनैव मार्गेण सच्चिदानन्दनिश्चयात् । परोक्षमपि तज्ज्ञानं तत्वज्ञानं न तु भ्रमः ॥१९॥ वह ज्ञान यद्यपि परोक्ष ही होता है परन्तु शास्त्रोक्त रीति से ही ब्रह्म के सच्चिदानन्द रूपका निश्चय करा देने के कारण उसे तत्वज्ञान ही मानना चाहिये। वह ज्ञान भ्रम ज्ञान नहीं है। ब्रह्म यद्यपि शास्त्रेषु प्रत्यक्त्वेनैव वर्णितम् । महावाक्यैस्तथाप्येतद् दुर्बोधमविचारिणः ॥२०॥ वेदान्तों [के महावाक्यों] ने तो ब्रह्म को प्रत्यगात्मा ही कहा है परन्तु जिस अविचारी [पुरुष ने अन्वयव्यतिरेक से तत् त्वं पदार्थों का विवेक नहीं किया है उस] के लिये यह बात अत्यन्त ही दुर्बोध होती है [इसी कारण कहते हैं कि केवल वाक्य से प्रत्यक्षज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु विचार सहित वाक्य से प्रत्यक्ष ज्ञान उत्पन्न होता है ]
३६२ पंचदशी देहाद्यात्मत्वविभ्रान्तौ जाग्रत्यां न हठात् पुमान्। ब्रह्मात्मत्वेन विज्ञातुं क्षमते मन्दधीत्वतः ॥२१॥ देहादि को आत्मा समझने का भ्रम जब तक किसी को बना हुआ है, तब तक कोई भी पुरुष मन्द बुद्धि होने के कारण, ब्रह्म को आत्मा जान ही नहीं सकता [ ब्रह्मज्ञान का विरोधी जो देहादियों में आत्मता का भ्रम बना हुआ है उस भ्रम को विचार ही हटा सकता है—उस भ्रम को हटाने के लिये केवल विचार की ही आवश्यकता है] ब्रह्ममात्रं सुविज्ञेयं श्रद्धालुः शास्त्रदर्शिनः । अपरोक्षद्वैतबुद्धिः परोक्षाद्वैतबुद्ध्यनुद् ॥२२॥ जो श्रद्धालु हैं, जो शास्त्रदर्शी हैं, उसको ब्रह्म का परोक्ष ज्ञान होजाना तो बड़ा ही सुकर है। क्योंकि अपरोक्षद्वैत बुद्धि परोक्ष अद्वैत बुद्धि को नष्ट करती ही नहीं। अपरोक्षशिलाबुद्धिर्न परोक्षेशतां नुदेत् । प्रतिमादिषु विष्णुत्वे को वा विप्रतिपद्यते ॥२३॥ लोक में भी देखलो, पत्थर की प्रतिमा में जो प्रत्यक्ष शिला बुद्धि होती है, वह उसके परोक्ष ईश्वरपने को हटा नहीं देती। प्रतिमा आदि को विष्णु मानते हुए किसी को दुविधा नहीं होती। अश्रद्धालो रविश्वासो नोदाहरणमर्हति । श्रद्धालुारेव सर्वत्र वैदिकेष्वधिकारतः ॥२४॥ इस मामले में अश्रद्धालु लोगों के अविश्वास का उदा- हरण देना ठीक नहीं है। क्योंकि वैदिक कामों में सब जगह श्रद्धालु ही अधिकारी होता है।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६३ सकृदाप्तोपदेशेन परोक्षज्ञान मुद्भवत् । विष्णुमूर्त्युपदेशो हि न मीमांसामपेक्षते ॥२५॥ आप्त पुरुष के एक बार के उपदेश से ही परोक्ष ज्ञान हो जाता है। लोक में भी देखलो कि विष्णुमूर्तिका उपदेश बहस और तर्क की अपेक्षा नहीं करता [जिसको उससे ज्ञान होना होता है उस पहली बार के उपदेश से ही हो जाता है । ] कर्मोपास्ती विचार्येते अनुष्ठेयाविनिर्णयात् । बहुशाखाविप्रकीर्णं निर्णोतुं कः प्रभुर्नरः ॥२६॥ अनुष्ठान करने योग्य कर्म तथा उपासनाओं में सन्देह हो सकता है, इससे उनका विचार किया जाता है। क्योंकि अनेक शाखाओं में जहां तहां प्रतिपादित किये हुए कर्म को कोई भी पुरुष सहसा निर्णय नहीं कर सकता । निर्णीतोऽर्थः कल्पसूत्रै ग्रथित स्तावतास्तिकः । विचारमन्तरेणापि शक्तोऽनुष्ठातुमञ्जसा ॥२७॥ जैमिनि आदि पूर्वाचार्यों ने जिस अर्थ का निश्चय कर दिया है, उसी अर्थ [कर्म पद्धति] को कल्प सूत्रों ने संग्रह कर लिया है। आस्तिक पुरुष तो बस इतने ही से सन्तुष्ट हो जाता है और विचार किये बिना भी कर्म को भले प्रकार कर सकता है । उपास्तीनामनुष्ठानमार्षग्रन्थेषु वर्णितम् । विचाराक्षममर्त्याश्च तच्छ्रुत्वोपासते गुरोः ॥२८॥ उपासनाओं की रीति भी आर्ष ग्रन्थों में कही गयी है । जो पुरुष स्वयं विचार नहीं कर सकते, वे कल्पों में कही हुई उपासनाओं को गुरुमुख से सुनकर करने लगते हैं ।
३६४ पञ्चदशी वेदवाक्यानि निर्णोतु मिच्छन् मीमांसतां जनः । आप्तोपदेशमात्रेण ह्यनुष्ठानं हि सम्भवेत् ॥२९॥ वेद वाक्यों का निर्णय चाहने वाला आजकल का पुरुष, अपनी बुद्धि को सन्तुष्ट करने के लिये उनका विचार करता है तो करे । उन कर्मों का अनुष्ठान तो केवल इतने से ही हो सकता है कि वे आप्तों के उपदेश हैं । ब्रह्मसाक्षात्कृति स्त्वेवं विचारेण विना नृणाम् । आप्तोपदेशमात्रेण न सम्भवति कुत्रचित् ॥३०॥ कर्मानुष्ठान की तरह, विचार किये विना केवल आप्त पुरुष के कहदेने से ही ब्रह्म साक्षात्कार तो कभी भी संभव नहीं है । परोक्षज्ञान मश्रद्धा प्रतिबध्नाति नेतरत् । अविचारोऽपरोक्षस्य ज्ञानस्य प्रतिबन्धकः ॥३१॥ अश्रद्धा ही परोक्षज्ञान को होने से रोकती रहती है, अवि- चार नहीं, [जब अश्रद्धा टूट जाती है तब एक बार के उपदेश से ही परोक्षज्ञान हो सकता है] अविचार तो अपरोक्षज्ञान का प्रतिबन्धक है । [विचार के द्वारा जब तक अविचार को निवृत्त नहीं कर दिया जाता तब तक अपरोक्षज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता इस कारण विचार करना चाहिये ।] विचार्याप्यापरोक्ष्येण ब्रह्मात्मानं न वेत्ति चेत् । आपरोक्ष्यावसानत्वादू भूयो भूयो विचारयेत् ॥३२॥ 'तत्' 'त्वं' पदार्थों को विचार कर भी यदि ब्रह्म और आत्मा की एकता को प्रत्यक्षरूप में नहीं जान सका है तो बार बार विचार ही करना चाहिये । क्योंकि विचार की समाप्ति तभी
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५ हो सकती है जब अपरोक्ष ज्ञान हो जाय [ अपरोक्ष ज्ञान करादेने के अतिरिक्त विचार का कोई भी काम नहीं है ] । विचारयन्नामरणं नैवात्मानं लभेत चेत् । जन्मान्तरे लभेतैव प्रतिबन्धक्षये सति ॥३३॥ मरण पर्यन्त विचार करते रहने पर भी यदि किसी को आत्मा का साक्षात्कार न हो गया हो तो,प्रतिबन्धों के हट जाने पर, दूसरे किसी जन्म में तो उसे साक्षात्कार हो ही जायगा । इह वामुत्र वा विद्येत्येवं सूत्रकृतोदितम् । शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युिरिति श्रुतिः ॥३४॥ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् (ब्रह्म सू० ३-४-५१)इस सूत्र में व्यास देव ने कहा है कि विचार करने वाले को इस जन्म या दूसरे जन्मों में ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । 'शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युः' ( क० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि प्रतिबन्ध होने पर बहुतों को इस जन्म में ज्ञान नहीं होता । गर्भ एव शयानः सन् वामदेवोऽवबुद्धवान् । पूर्वाभ्यस्तविचारेण यद्वदध्ययनादिषु ॥३५॥ 'गर्भे नु सन्नन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ( ऐतरेय ४- ५ ) इस श्रुति में कहा गया है कि—वामदेव को गर्भवास के दिनों में ही अपरोक्ष ज्ञान हो गया था । इससे यह सिद्ध होता है कि इस जन्म में श्रवणादि कर लेने वाले को दूसरे जन्म में ३४—कोई प्रतिबन्ध न हो तो श्रवण आदि से इस जन्म में भी ज्ञान हो जाता है । प्रतिबन्ध हो तो इस जन्म में न होकर दूसरे जन्मों में होता है । प्रतिबन्ध के साधक प्रमाण देखे जाते हैं । जैसे कि वामदेव को गर्भ में ज्ञान हुआ था । बहुत से तो इस तत्व को सुन कर भी नहीं समझते हैं ।
भी अपरोक्ष ज्ञान होता है। दैनिक व्यवहार में भी देख लो कि—पठन पाठन आदि कामों में पहले अभ्यास किये हुए विचार से कभी कभी अगले दिन बिना ही याद किये स्मरण आ जाता है। बहुवारमधीतेऽपि तदा नायाति चेत् पुनः। दिनान्तरेऽनधीत्यैव पूर्वाधीतं स्मरेत् पुमान् ॥३६॥ बहुत बार याद करने पर भी, उस दिन यदि याद नहीं आता,तो कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन बिना ही याद किये पहले पढ़े हुए पाठ याद आ जाते हैं। कालेन परिपच्यन्ते कृषिगर्भादयो यथा। तद्वदात्मविचारोपि शनैः कालेन पच्यते ॥३७॥ खेती और गर्भ आदि जैसे तुरन्त ही तैयार नहीं हो जाते। किन्तु पकने में इन्हें कुछ समय लगता ही है। इसी प्रकार आत्मविचार भी धीरे-धीरे काल पाकर परिपक्व हुआ करता है। पुनः पुनर्विचारेऽपि त्रिविधप्रतिबन्धतः । न वेत्ति तत्वमित्येतद् वार्तिके सम्यगीरितम् ॥३८॥ बार बार विचार करने पर भी, तीन प्रकार के प्रतिबन्धों के होने से तत्व का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यह बात वार्तिककार ने भले प्रकार समझायी है । कुतस्तज्ज्ञानमिति चेत् तद्धि बन्धपरिक्षयात् । असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा ॥३९॥ वार्तिककार ने उन प्रतिबन्धों का निरूपण इन नौ श्लोकों में यों किया है—जो ज्ञान पहले जन्म में उत्पन्न नहीं हो पाया था वह ज्ञान अब इस दूसरे जन्म में किस कारण से उत्पन्न
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७ हुआ करता है ? इसका उत्तर यह है कि प्रतिबन्ध के क्षीण हो जाने से वह ज्ञान हो जाता है। वह प्रतिबन्ध (१) भूत (२) भावी और (३) वर्तमान भेद से तीन प्रकार का होता है। अधीतवेदवेदार्थोऽप्यत एव न मुच्यते । हिरण्यनिधिदृष्टान्तादिदमेव हि दर्शितम् ॥४०॥ किसी प्रतिबन्ध के होने से ही वेद के ज्ञाता लोग भी मुक्त नहीं हो पाते 'तद्यथा हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुः एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरह र्ब्रह्मलोकं गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः' [छा० ८-३-२] भूगर्भविद्या को न जानने वाले लोग, हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते भी रहते हैं, परन्तु उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रति दिन ब्रह्म के पास जाती हैं परन्तु विषयवासना रूपी अनृत से ढकी रहने के कारण उसको पा नहीं सकती ।] हिरण्य- निधि के दृष्टान्त से इस प्रतिबन्ध को ही दिखाया गया है। अतीतेनापि महिषीस्नेहेन प्रतिबन्धतः । भिक्षुस्तत्त्वं न वेदेति गाथा लोके प्रगीयते ॥४१॥ भूत प्रतिबन्धक को लोक में देखलो कि बीते हुए महिषी के स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण भिक्षु ने तत्व को नहीं जाना था। यह गाथा वेदान्त संप्रदाय में प्रसिद्ध है । [कोई यति पहले गृहस्थ आश्रम में किसी भैंस पर बड़ा प्रेम रखता था। इसी बीच में उसने संन्यास लेलिया। वेदान्तका श्रवण करने पर भी उसी महिषी स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण गुरु से कही हुई बात उसकी समझ में नहीं आयी थी।
३६८ पञ्चदशी अनुसृत्य गुरुः स्नेहं महिष्यां तत्व मुक्तवान् । ततो यथावद् वेदैष प्रतिबन्धस्य संक्षयात् ॥४२॥ गुरु ने उसके महिषी स्नेह का अनुसरण करके महिषी में [रूपी उपाधि में] ही तत्व [ ब्रह्म ] बतादिया था । तब उसने महिषी की उपासना की और उपासना करते करते जब उसके [महिषीस्नेह रूपी] प्रतिबन्ध का क्षय होगया तब वह पूर्ण रूप से ज्ञानी हो गया था । प्रतिबन्धो वर्तमानो विषयासक्तिलक्षणः । प्रज्ञामान्द्यं कुतर्कश्च विपर्ययदुराग्रहः ॥४३॥ वर्तमान प्रतिबन्धों में से पहला तो विषयासक्ति है । दूसरा प्रज्ञा की मन्दता है । तीसरा कुतर्क है [जिसके कारण श्रुति के अर्थ की अन्यथा ऊहना की जाती है] चौथा प्रति- बन्ध अपने विपरीत ज्ञान पर दुराग्रह करते जाना है । [आत्मा कर्ता भोक्ता है, यह विपरीत ज्ञान कहाता है । इस बात पर बिना युक्ति के डटे रहना चौथा प्रतिबन्ध है । [इन चारों में से कोई भी एक हो तो ज्ञान का उदय नहीं होता । ] शमाद्यैः श्रवणद्यैश्च तत्रतत्रोचितैः क्षयम् । नीतेऽस्मिन् प्रतिबन्धेऽतः स्वस्य ब्रह्मत्वमश्नुते ॥४४॥ शम दम उपरति आदि तथा श्रवण मनन निदिध्यासनों में से जो जो जिस जिस प्रतिबन्ध को हटा सकते हों, उन उन से उस उस प्रतिबन्ध के नष्ट कर दिये जाने पर, अपने आपही अपने ब्रह्मभाव की प्राप्ति होजाती है । आगामिप्रतिबन्धश्च वामदेवे समीरितः । एकेन जन्मना क्षीणो, भरतस्य त्रिजन्मभिः ॥४५॥
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६९
ध्यानदीपप्रकरणम् ३६९ जन्मान्तर दिलाने वाला आगामी प्रतिबन्ध [जिसे कि प्रारब्धशेष भी कहते हैं, वह भोग के बिना निवृत्त हो ही नहीं सकता। इस कारण उसकी निवृत्ति का काल भी नियत नहीं किया जा सकता। वह प्रतिबन्ध] एक जन्म में तो वामदेव का क्षीण हो पाया था। भरत का तो [नृप-मृग और जड भरत इन] तीन जन्मों में क्षीण होसका था। योगभ्रष्टस्य गीतायामतीते बहुजन्मनि । प्रतिबन्धक्षयः प्रोक्तो न विचारोऽप्यनर्थकः॥४६॥ जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं, [जो तत्वसाक्षात्कार तक विचार नहीं कर पाते हैं, जिन का विचार बीच में ही टूट जाता है] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में बहुत जन्म लग जाते हैं। [एक दो या तीन जन्मों का कोई भी नियम नहीं है] परन्तु इस रुका- वट के कारण विचार व्यर्थ नहीं हो जाता है [क्योंकि प्रतिबन्ध के हटते ही फिर तुरन्त अपरोक्षज्ञानरूपी फल देखा जाता है।] प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्नात्मतत्त्वविचारतः । शुचीनां श्रीमतां गेहे साभिलाषोऽभिजायते ॥४७॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । निस्पृहो ब्रह्मतत्त्वस्य विचारात् तद्धि दुर्लभम् ॥४८॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयस्तस्मादेतद्धि दुर्लभम् ॥४९॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥५०॥ गीता में कहा है कि—योगभ्रष्ट लोग आत्मतत्त्व के विचार
३७० पञ्चदशी
के प्रभाव से, पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोकों को पाकर—वहाँ बहुत दिन तक सुख भोग कर—उस भोग के समाप्त हो जान पर,यदि उन्हें फिर भी कोई अभिलाषा रह गई हो, तो पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लिया करते हैं ॥४७॥ यदि तो वह योगभ्रष्ट ब्रह्मतत्व का विचार करते रहने से निस्पृह [विरक्त] हो चुका हो तो वह उस विचार के प्रभाव से ऐसे लोगों के कुल में जन्म लेता है,जिनको आत्मतत्व का पूर्ण निश्चय हुआ रहता है। योगिकुल का यह जन्म बड़ा ही दुर्लभ है, थोड़े [मामूली] पुण्यों से यह किसी को नहीं मिल जाता ॥४८॥ क्योंकि इस योगियों के कुल में जन्म लेने पर वह योग- भ्रष्ट पहले देह के बुद्धिसंयोग को शीघ्र ही पा लता है। [वहाँ उसको योग के अनुकूल सामग्री तैयार मिलती है] फिर तो वह पहले प्रयत्न से भी अधिक प्रयत्न करने लग पड़ता है। इसी से कहते हैं कि ऐसा जन्म दुर्लभ होता है ॥ ४९ ॥ [फिर वैसा ही अभ्यास करने का कारण मो यह है कि] उस योगभ्रष्ट पुरुष को वह पूर्वाभ्यास जबरदस्ती अपनी ओर को खेंच ले जाता है। [समाधिनिद्रा उसको स्वयं ही ढूँढती फिरती है] यों अनेक जन्मों पर्यन्त किये गये प्रयत्नों से तत्व- ज्ञान को पाकर कहीं परागति किंवा मुक्ति को पा लेता है ॥५०॥ ब्रह्मलोकाभिवाञ्छायां सम्यक् सत्यां निरुध्य ताम् । विचारयेद् य आत्मानं न तु साक्षात् करोत्ययम् ॥५१॥ ब्रह्मलोक को पाने की दृढ इच्छा हो, परन्तु जो उस इच्छा को दबा कर आत्मविचार करता रहेगा, उसे आत्मसाक्षात्कार होगा ही नहीं।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था इति शास्त्रतः । ब्रह्मलोके स कल्पान्ते ब्रह्मणा सह मुच्यते ॥५२॥ वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे । ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे परस्यान्ते कृतात्मनः प्रविशन्ति परं पदम् । (मु० ३- २-६) इस शास्त्र के कथनानुसार वे ब्रह्मलोक में जाते हैं । वहाँ उन्हें तत्त्व का साक्षात्कार होता है । कल्पान्त के समय ब्रह्म के साथ वे भी मुक्त हो जाते हैं [ यों उनकी क्रममुक्ति होती है ] । केषांचित् स विचारोपि कर्मणा प्रतिबध्यते । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य इति श्रुतेः ॥५३॥ [तत्वविचार करते हुए भी किसी प्रतिबन्ध के कारण, इस जन्म में कइयों को साक्षात्कार नहीं हो पाता । दूसरे जन्मों में साक्षात् होता है] परन्तु कई ऐसे भी लोग होते हैं कि-उनके पाप कर्मों से विचार में भी रुकावट पड़ जाती है । उनको तो विचार का अवसर भी नहीं मिलता है । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः (क० २-७) इस श्रुति में भी यही कहा गया है कि वह परमात्मतत्त्व बहुत से पापियों को तो सुनने को भी नसीब नहीं होता । अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद् वा सामग्र्या वाप्यसंभवात् । यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥५४॥ बुद्धि के अति मन्द होने के कारण, अथवा ज्ञान की सामग्री [गुरु या अध्यात्म शास्त्र या अनुकूल देश कालादि के] न मिलने से,जो विचार न कर सकता हो
प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ]
३७२ पञ्चदशी हो] वह प्रति क्षण ब्रह्म की उपासना ही किया करे । [ इस प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ] निर्गुणब्रह्मतत्त्वस्य न ह्युपास्ते रसम्भवः । सगुणब्रह्मणीवात्र प्रत्ययावृत्तिसंभवात् ॥५५॥ गुणरहित होने के कारण निर्गुण ब्रह्मतत्त्व की उपासना हो नहीं सकती है, ऐसा विचार ठीक नहीं है । क्योंकि सगुण ब्रह्म में जैसे प्रत्यय की आवृत्ति हो सकती है, वैसी आवृत्ति, इस निर्गुण ब्रह्म में भी हो ही सकती है [यों निर्गुण तत्त्व की उपा- सना संभव हो जाती है । ] अवाङ्मनसगम्यं तन्नोपास्यमिति चेत् तदा । अवाङ्मनसगम्यस्य वेदनं न च संभवेत् ॥५६॥ वाणी और मन से अज्ञेय होने के कारण वह निर्गुण ब्रह्म यदि तुम्हारी समझ में उपास्य न हो सकता हो, तो फिर यों तो वाणी और मन से अगम्य उस तत्त्व का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा । वागाद्यगोचराकार मित्येवं यदि वेत्त्यसौ । वागाद्यगोचराकार मित्युपासीत नो कुतः ॥५७॥ यदि कहा जाय कि 'इस ब्रह्म का आकार वागादि के गोचर होने वाला नहीं है' इस रूप से उसे जान तो सकते हैं। तो हम कहेंगे कि फिर इसी [वागादि के अगोचर] रूप से ही उसकी उपासना क्यों नहीं हो सकती है ? [हम तो कहेंगे कि उस रूप से ही उसकी उपासना भी की जा सकती है ।] सगुणत्व मुपास्यत्वाद्यदि, वेद्यत्वतोऽपि तत् । वेद्यं चेल्लक्षणावृत्त्या लक्षितं समुपास्यताम् ॥५८॥
यदि तुमको उपास्य होने से सगुणता का भय प्रतीत होता हो तो, वह भय तो वेद्य होने से भी होगा ही। यदि कहो कि वह वेद्य तो लक्षणा वृत्ति से होता है [इसीलिए सगुण नहीं होता] तो हम कहेंगे कि उपासना भी लक्षणा से ही कर डालो। ब्रह्म विद्धि तदेव त्वं न त्विदं यदुपासते । इति श्रुते रुपास्यत्वं निषिद्धं ब्रह्मणो यदि ॥५९॥ 'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' ( केन १-५ ) यह श्रुति, जो उपास्य है उसके ब्रह्म होने का निषेध कर रही है। यह कहती है — जो मन वाणी का अगम्य तत्व है, उसी को तुम ब्रह्म समझो ! संसार के लोग जिसको 'यह' समझकर उपासना कर रहे हैं उसको ब्रह्म मत समझो। यह शंका यदि किसी को हो तो— विदितादन्यदेवेति श्रुते र्वेद्यत्वमस्य न । यथा श्रुत्यैव वेद्यं चेत्तथा श्रुत्याप्युपास्यताम् ॥६०॥ उसका उत्तर यह है कि—अन्यदेव तद्विदितादयो अविदिता- दधि (केन १-३) इस श्रुति ने तो इसके वेद्य होने का भी निषेध किया है। यदि श्रुति के कथनानुसार ब्रह्म को विदित और अविदित से अनोखा ही मान लेना चाहिये तो श्रुति के कथनानुसार वैसे ही की उपासना भी कर लेनी चाहिये । अवास्तवी वेद्यता चेदुपास्यत्वं तथा न किम् । वृत्तिव्याप्ति र्वेद्यता चेदुपास्यत्वेऽपि तत्समम् ॥६१॥ यदि कहो कि—वेद्यता तो ब्रह्म में वास्तव नहीं है। तो हम कहेंगे कि—उसमें उपास्यता भी वास्तव नहीं है। यदि कहा जाय कि—वेदन पक्ष में वृत्ति ब्रह्माकार हो सकती है तो
३७४ पञ्चदशी हम कहेंगे उपास्य पक्ष में भी [ शब्द प्रमाण के बल से ] वृत्ति ब्रह्माकार हो ही सकती है । वृत्ति का ब्रह्माकार होना दोनों ही पक्षों में समान हो सकता है । का ते भक्ति रुपास्तौ चेत् कस्ते द्वेषस्तदीरय । मानाभावो न वाच्योऽस्यां बहुश्रुतिषु दर्शनात् ॥६२॥ यदि मुझ पर यह युक्ति-शून्य उलहना दो, कि उपास्ति में तुम्हें इतनी भक्ति क्यों है ? तो हम पूछेंगे कि तुम्हें उपासना से ही इतना द्वेष क्यों होगया है ? निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने के प्रमाण नहीं मिलते यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि अनेक श्रुतियों में निर्गुण ब्रह्म की उपासना देखी ही गयी है । उत्तरस्मिंस्तापनीये शैब्यप्रश्नेऽथ काठके । माण्डूक्यादौ च सर्वत्र निर्गुणोपास्तिरीरिता ॥६३॥ निर्गुणोपासना को बताने वाली बहुत सी श्रुतियाँ भी देख लो—शैब्य के प्रश्न करनेपर तापनीय उपनिषत् में निर्गुणो- पासना का कथन किया गया है । प्रश्न उपनिषत् के पाँचवें प्रश्न में ‘यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत’ ( प्रश्न ५-५ ) में निर्गुणोपासना का वर्णन आया है । कठोपनिषत् में ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ( कठ २-१५ ) से प्रारम्भ करके ‘एत- द्ध्येवाक्षरं ब्रह्म’ ( कठ-२-१६ ) ‘एतदालम्बनं श्रेष्ठम्’ ( कठ-२-१७) इत्यादि से प्रणवोपासना कही गई है । माण्डूक्य उपनिषत् में ‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्’ इत्यादि से तीनों अवस्थाओं से परे रहनेवाले चतुर्थ तत्व की उपासना बतायी गयी है । तैत्तिरीय मुण्डक आदि में भी निर्गुणोपास्ति का वर्णन आया ही है ।
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५
ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५ अनुष्ठानप्रकारोऽस्याः पञ्चीकरण ईरितः । ज्ञानसाधनमेतच्चेनेति केनात्र वारितम् ॥६४॥ इस निर्गुणोपासना को कैसे करें ? यह बात श्रीमच्छंकरा- चार्य के 'पंचीकरण' नाम के ग्रन्थ में कही है। यदि कहो कि यह उपासना मुक्ति का साधन नहीं है, यह तो ज्ञान का ही साधन है । तो हम कहेंगे कि हम इस बात का निषेध नहीं करते । यह तो हमें स्वीकार ही है। नानुतिष्ठति कोप्येतदिति चेन्मानुतिष्ठतु । पुरुषस्यापराधेन किमुपास्तिः प्रदुष्यति ॥६५॥ यदि कहो कि सगुणोपासना करने वाले तो बहुत से पाये जाते हैं, निर्गुणोपासना तो कोई भी करता नहीं दीखता । तो हम कहेंगे कि—भले ही कोई निर्गुणोपासना न करो, यह तो करनेवाले पुरुषों की कमी है। पुरुष की कमी से उपासना का क्या बिगड़ता है ? इतोऽप्यतिशयं मत्वा मन्त्रान् वश्यादिकारिणः । मूढा जपन्तु तेभ्योऽतिमूढाः कृषिमुपासताम् ॥६६॥ सगुणोपासना से भी सुकर देखकर मूढ लोग वशीकरण आदि मन्त्रों का जप करें, उनसे भी मूर्ख लोग खेती करलें तो भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को कैसे छोड़ देंगे ? सगुणोपासना का फल भी बहुत दिनों बाद मिलता है। इस कारण ऐहिकफल देने की अधिकता को देखकर, मूढ लोग वशीकरणादि मन्त्रों का जप करें। परन्तु उन्हें देखकर विवेकी लोग सगुणोपासना को छोड़ नहीं देते हैं। अथवा उनसे भी अतिमूर्ख लोग, किसी भी नियम में न बँधने की स्वतन्त्रता