पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७० पञ्चदशी
के प्रभाव से, पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोकों को पाकर—वहाँ बहुत दिन तक सुख भोग कर—उस भोग के समाप्त हो जान पर,यदि उन्हें फिर भी कोई अभिलाषा रह गई हो, तो पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लिया करते हैं ॥४७॥ यदि तो वह योगभ्रष्ट ब्रह्मतत्व का विचार करते रहने से निस्पृह [विरक्त] हो चुका हो तो वह उस विचार के प्रभाव से ऐसे लोगों के कुल में जन्म लेता है,जिनको आत्मतत्व का पूर्ण निश्चय हुआ रहता है। योगिकुल का यह जन्म बड़ा ही दुर्लभ है, थोड़े [मामूली] पुण्यों से यह किसी को नहीं मिल जाता ॥४८॥ क्योंकि इस योगियों के कुल में जन्म लेने पर वह योग- भ्रष्ट पहले देह के बुद्धिसंयोग को शीघ्र ही पा लता है। [वहाँ उसको योग के अनुकूल सामग्री तैयार मिलती है] फिर तो वह पहले प्रयत्न से भी अधिक प्रयत्न करने लग पड़ता है। इसी से कहते हैं कि ऐसा जन्म दुर्लभ होता है ॥ ४९ ॥ [फिर वैसा ही अभ्यास करने का कारण मो यह है कि] उस योगभ्रष्ट पुरुष को वह पूर्वाभ्यास जबरदस्ती अपनी ओर को खेंच ले जाता है। [समाधिनिद्रा उसको स्वयं ही ढूँढती फिरती है] यों अनेक जन्मों पर्यन्त किये गये प्रयत्नों से तत्व- ज्ञान को पाकर कहीं परागति किंवा मुक्ति को पा लेता है ॥५०॥ ब्रह्मलोकाभिवाञ्छायां सम्यक् सत्यां निरुध्य ताम् । विचारयेद् य आत्मानं न तु साक्षात् करोत्ययम् ॥५१॥ ब्रह्मलोक को पाने की दृढ इच्छा हो, परन्तु जो उस इच्छा को दबा कर आत्मविचार करता रहेगा, उसे आत्मसाक्षात्कार होगा ही नहीं।