पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीपप्रकरणम् ३७१
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था इति शास्त्रतः । ब्रह्मलोके स कल्पान्ते ब्रह्मणा सह मुच्यते ॥५२॥ वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे । ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे परस्यान्ते कृतात्मनः प्रविशन्ति परं पदम् । (मु० ३- २-६) इस शास्त्र के कथनानुसार वे ब्रह्मलोक में जाते हैं । वहाँ उन्हें तत्त्व का साक्षात्कार होता है । कल्पान्त के समय ब्रह्म के साथ वे भी मुक्त हो जाते हैं [ यों उनकी क्रममुक्ति होती है ] । केषांचित् स विचारोपि कर्मणा प्रतिबध्यते । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य इति श्रुतेः ॥५३॥ [तत्वविचार करते हुए भी किसी प्रतिबन्ध के कारण, इस जन्म में कइयों को साक्षात्कार नहीं हो पाता । दूसरे जन्मों में साक्षात् होता है] परन्तु कई ऐसे भी लोग होते हैं कि-उनके पाप कर्मों से विचार में भी रुकावट पड़ जाती है । उनको तो विचार का अवसर भी नहीं मिलता है । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः (क० २-७) इस श्रुति में भी यही कहा गया है कि वह परमात्मतत्त्व बहुत से पापियों को तो सुनने को भी नसीब नहीं होता । अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद् वा सामग्र्या वाप्यसंभवात् । यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥५४॥ बुद्धि के अति मन्द होने के कारण, अथवा ज्ञान की सामग्री [गुरु या अध्यात्म शास्त्र या अनुकूल देश कालादि के] न मिलने से,जो विचार न कर सकता हो