भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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यदि तुमको उपास्य होने से सगुणता का भय प्रतीत होता हो तो, वह भय तो वेद्य होने से भी होगा ही। यदि कहो कि वह वेद्य तो लक्षणा वृत्ति से होता है [इसीलिए सगुण नहीं होता] तो हम कहेंगे कि उपासना भी लक्षणा से ही कर डालो। ब्रह्म विद्धि तदेव त्वं न त्विदं यदुपासते । इति श्रुते रुपास्यत्वं निषिद्धं ब्रह्मणो यदि ॥५९॥ 'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' ( केन १-५ ) यह श्रुति, जो उपास्य है उसके ब्रह्म होने का निषेध कर रही है। यह कहती है — जो मन वाणी का अगम्य तत्व है, उसी को तुम ब्रह्म समझो ! संसार के लोग जिसको 'यह' समझकर उपासना कर रहे हैं उसको ब्रह्म मत समझो। यह शंका यदि किसी को हो तो— विदितादन्यदेवेति श्रुते र्वेद्यत्वमस्य न । यथा श्रुत्यैव वेद्यं चेत्तथा श्रुत्याप्युपास्यताम् ॥६०॥ उसका उत्तर यह है कि—अन्यदेव तद्विदितादयो अविदिता- दधि (केन १-३) इस श्रुति ने तो इसके वेद्य होने का भी निषेध किया है। यदि श्रुति के कथनानुसार ब्रह्म को विदित और अविदित से अनोखा ही मान लेना चाहिये तो श्रुति के कथनानुसार वैसे ही की उपासना भी कर लेनी चाहिये । अवास्तवी वेद्यता चेदुपास्यत्वं तथा न किम् । वृत्तिव्याप्ति र्वेद्यता चेदुपास्यत्वेऽपि तत्समम् ॥६१॥ यदि कहो कि—वेद्यता तो ब्रह्म में वास्तव नहीं है। तो हम कहेंगे कि—उसमें उपास्यता भी वास्तव नहीं है। यदि कहा जाय कि—वेदन पक्ष में वृत्ति ब्रह्माकार हो सकती है तो