भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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३७४ पञ्चदशी हम कहेंगे उपास्य पक्ष में भी [ शब्द प्रमाण के बल से ] वृत्ति ब्रह्माकार हो ही सकती है । वृत्ति का ब्रह्माकार होना दोनों ही पक्षों में समान हो सकता है । का ते भक्ति रुपास्तौ चेत् कस्ते द्वेषस्तदीरय । मानाभावो न वाच्योऽस्यां बहुश्रुतिषु दर्शनात् ॥६२॥ यदि मुझ पर यह युक्ति-शून्य उलहना दो, कि उपास्ति में तुम्हें इतनी भक्ति क्यों है ? तो हम पूछेंगे कि तुम्हें उपासना से ही इतना द्वेष क्यों होगया है ? निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने के प्रमाण नहीं मिलते यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि अनेक श्रुतियों में निर्गुण ब्रह्म की उपासना देखी ही गयी है । उत्तरस्मिंस्तापनीये शैब्यप्रश्नेऽथ काठके । माण्डूक्यादौ च सर्वत्र निर्गुणोपास्तिरीरिता ॥६३॥ निर्गुणोपासना को बताने वाली बहुत सी श्रुतियाँ भी देख लो—शैब्य के प्रश्न करनेपर तापनीय उपनिषत् में निर्गुणो- पासना का कथन किया गया है । प्रश्न उपनिषत् के पाँचवें प्रश्न में ‘यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत’ ( प्रश्न ५-५ ) में निर्गुणोपासना का वर्णन आया है । कठोपनिषत् में ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ( कठ २-१५ ) से प्रारम्भ करके ‘एत- द्ध्येवाक्षरं ब्रह्म’ ( कठ-२-१६ ) ‘एतदालम्बनं श्रेष्ठम्’ ( कठ-२-१७) इत्यादि से प्रणवोपासना कही गई है । माण्डूक्य उपनिषत् में ‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्’ इत्यादि से तीनों अवस्थाओं से परे रहनेवाले चतुर्थ तत्व की उपासना बतायी गयी है । तैत्तिरीय मुण्डक आदि में भी निर्गुणोपास्ति का वर्णन आया ही है ।