पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 389, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीपप्रकरणम् ३६७ हुआ करता है ? इसका उत्तर यह है कि प्रतिबन्ध के क्षीण हो जाने से वह ज्ञान हो जाता है। वह प्रतिबन्ध (१) भूत (२) भावी और (३) वर्तमान भेद से तीन प्रकार का होता है। अधीतवेदवेदार्थोऽप्यत एव न मुच्यते । हिरण्यनिधिदृष्टान्तादिदमेव हि दर्शितम् ॥४०॥ किसी प्रतिबन्ध के होने से ही वेद के ज्ञाता लोग भी मुक्त नहीं हो पाते 'तद्यथा हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुः एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरह र्ब्रह्मलोकं गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः' [छा० ८-३-२] भूगर्भविद्या को न जानने वाले लोग, हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते भी रहते हैं, परन्तु उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रति दिन ब्रह्म के पास जाती हैं परन्तु विषयवासना रूपी अनृत से ढकी रहने के कारण उसको पा नहीं सकती ।] हिरण्य- निधि के दृष्टान्त से इस प्रतिबन्ध को ही दिखाया गया है। अतीतेनापि महिषीस्नेहेन प्रतिबन्धतः । भिक्षुस्तत्त्वं न वेदेति गाथा लोके प्रगीयते ॥४१॥ भूत प्रतिबन्धक को लोक में देखलो कि बीते हुए महिषी के स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण भिक्षु ने तत्व को नहीं जाना था। यह गाथा वेदान्त संप्रदाय में प्रसिद्ध है । [कोई यति पहले गृहस्थ आश्रम में किसी भैंस पर बड़ा प्रेम रखता था। इसी बीच में उसने संन्यास लेलिया। वेदान्तका श्रवण करने पर भी उसी महिषी स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण गुरु से कही हुई बात उसकी समझ में नहीं आयी थी।