पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ पञ्चदशी अनुसृत्य गुरुः स्नेहं महिष्यां तत्व मुक्तवान् । ततो यथावद् वेदैष प्रतिबन्धस्य संक्षयात् ॥४२॥ गुरु ने उसके महिषी स्नेह का अनुसरण करके महिषी में [रूपी उपाधि में] ही तत्व [ ब्रह्म ] बतादिया था । तब उसने महिषी की उपासना की और उपासना करते करते जब उसके [महिषीस्नेह रूपी] प्रतिबन्ध का क्षय होगया तब वह पूर्ण रूप से ज्ञानी हो गया था । प्रतिबन्धो वर्तमानो विषयासक्तिलक्षणः । प्रज्ञामान्द्यं कुतर्कश्च विपर्ययदुराग्रहः ॥४३॥ वर्तमान प्रतिबन्धों में से पहला तो विषयासक्ति है । दूसरा प्रज्ञा की मन्दता है । तीसरा कुतर्क है [जिसके कारण श्रुति के अर्थ की अन्यथा ऊहना की जाती है] चौथा प्रति- बन्ध अपने विपरीत ज्ञान पर दुराग्रह करते जाना है । [आत्मा कर्ता भोक्ता है, यह विपरीत ज्ञान कहाता है । इस बात पर बिना युक्ति के डटे रहना चौथा प्रतिबन्ध है । [इन चारों में से कोई भी एक हो तो ज्ञान का उदय नहीं होता । ] शमाद्यैः श्रवणद्यैश्च तत्रतत्रोचितैः क्षयम् । नीतेऽस्मिन् प्रतिबन्धेऽतः स्वस्य ब्रह्मत्वमश्नुते ॥४४॥ शम दम उपरति आदि तथा श्रवण मनन निदिध्यासनों में से जो जो जिस जिस प्रतिबन्ध को हटा सकते हों, उन उन से उस उस प्रतिबन्ध के नष्ट कर दिये जाने पर, अपने आपही अपने ब्रह्मभाव की प्राप्ति होजाती है । आगामिप्रतिबन्धश्च वामदेवे समीरितः । एकेन जन्मना क्षीणो, भरतस्य त्रिजन्मभिः ॥४५॥