पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ
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१६० पञ्चदशी
वेदान्तेभ्यो ब्रह्मतत्व मखण्डैकरसात्मकम् ।
परोक्षमवगम्यैतदहमस्मीत्युपासते ॥१४॥
वेदान्तों के द्वारा अखण्ड एकरसात्मक ब्रह्मतत्व को परोक्ष
रूप से जब जान लेते हैं तब उसके बाद उस ब्रह्म को 'अहं
ब्रह्मास्मि' (बृ० १-३-१०) मैं ब्रह्म हूँ इस रूप में उपासना करने
लगते हैं। [शास्त्र से परोक्ष रूप से जान लिया हुआ ब्रह्म उपा-
सना का विषय होता है।]
प्रत्यग्व्यक्तिमनुल्लिख्य शास्त्राद् विष्ण्वादिमूर्तिवत् ।
अस्ति ब्रह्मेति सामान्यज्ञानमत्र परोक्षधीः ॥१५॥
विष्णु आदि की मूर्ति को बताने वाले शास्त्र के कहने से
जैसे मूर्ति का परोक्ष ज्ञान हो जाता है, उसी तरह प्रत्यक्षरूप से
आत्मा को विषय न भी करके जब वेदान्त के कहने से केवल
इतना सामान्य ज्ञान हो जाता है कि 'ब्रह्म है' तब यही ज्ञान इस
उपासना में 'परोक्षज्ञान' कहाता है।
चतुर्भुजाद्यवगतावपि मूर्ति मनुल्लिखन् ।
अक्षैः परोक्षज्ञान्येव न तदा विष्णुमीक्षते ॥१६॥
शास्त्र से तो विष्णु को चतुर्भुज आदि जान लिया जाता है,
परन्तु भावना के प्रताप से जब तक वह मूर्ति इन्द्रियों से दीख
नहीं पड़ती, तब तक पुरुष परोक्ष ज्ञानी ही रहता है। क्योंकि
उपासना के समय वह साधक अपने उपास्य विष्णु को नहीं
देखता।
परोक्षत्वापराधेन भवेन्नातत्त्ववेदनम् ।
प्रमाणेनैव शास्त्रेण सत्वमूर्तेर्विभासनात् ॥१७॥
परोक्षता रूपी कमी से ही कोई ज्ञान मिथ्याज्ञान नहीं हो