भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 381

ध्यानदीपप्रकरणम् ३५९ प्रत्यक्ष अनुमान तथा शास्त्रों में उक्त प्रकार के अनन्त 'संवादिभ्रम' पाये जाते हैं । अन्यथा मृत्तिकादारुशिलाः स्युर्देवताः कथम् । अग्नित्वादिधियोपास्याः कथं वा योषिदादयः ॥११॥ यदि संवादिभ्रम कोई चीज़ न हो तो, मिट्टी लकड़ी और पत्थर की प्रतिमायें देवता कैसे हो जांय ? ये तो संवादिभ्रम को मान करही फलसिद्धि के लिये देवता भाव से पूजी जाती हैं। यदि संवादिभ्रम न हो तो स्त्री आदि को अग्नि आदि समझकर उपासना का विधान क्यों किया जाय ? 'मनोब्रह्मे- त्युपासीत (छा० ३-१८-१) आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' (छा० ३-१९-१) इत्यादि की भी यही गति है। ये भी सब संवादिभ्रम ही हैं] अयथावस्तुविज्ञानात् फलं लभ्यत ईप्सितम् । काकतालीयतः सोऽयं संवादिभ्रम उच्यते ॥१२॥ वस्तु को उलटा समझ कर भी जब किसी को काक- तालीयन्याय किंवा दैवगति से अभिलषित फल मिल जाता है तब यही 'संवादिभ्रम' कहाता है । स्वयंभ्रमोपि संवादी यथा सम्यक् फलप्रदः । ब्रह्मतत्त्वोपासनापि तथा मुक्तिफलप्रदा ॥१३॥ संवादी भ्रम यद्यपि स्वयं भ्रम ही है, तौ भी जैसे वह ठीक फलदायी हो जाता है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्व की उपासना भी यद्यपि अयथावस्तुविषयक ( यथार्थ वस्तु को विषय न करने वाली किंवा यथार्थ वस्तु तक न पहुँचनेवाली ) होती है तौ भी मुक्तिरूपी फल को तो दे ही जाती है ।