पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ पंचदशी इतना ही करना पड़ेगा, कि हम अपनी बुद्धिवृत्ति को, उसके आकार का बना डालें। ऐसा करने पर व्यापक चेतन को आवृत कर रखने वाला अज्ञान, नष्ट हो जायगा और स्वयं प्रकाश तत्व अपने आप ही दीखने लग पड़ेगा। परन्तु अनादि काल से हमारे मन में बैठे हुए ये विचार ही कि "हम व्यापक कैसे हो सकते हैं ? हम तो कुछ करने और कुछ भोगने वाले तथा परिमित क्षेत्र में बद्ध रहने वाले प्राणी हैं" हमारे इस व्यापक रूप के दर्शन को दृढ नहीं होने देते हैं। हमें अपने इस व्यापक रूप में या तो संदेह बना रह जाता है या अपना यह व्यापक रूप भूल कर फिर फिर वही संकीर्णता की भावना जाग उठती है। परन्तु जब हम सर्वात्मना तत्पर होंगे, तब तो व्यापक रूप के दर्शन में सफल न होने का कोई कारण ही नहीं रह जायगा। इस प्रकार के आत्म- दर्शन में विघ्न डालने वाली असंभावना और विपरीत भावना को हटाने का एक मात्र यही उपाय है कि आत्मतत्व में बुद्धि की एकाग्रता के प्रयत्न को निरन्तर चालू रखा जाय। नहीं तो अनादि काल की वासनाएँ इस विचार रूपी नन्हें बालक को पनपने ही नहीं देंगी। एक बात विशेष ध्यान रखने की है कि इस तत्व को यदि हम कुछ काल के लिए भूल भी जायेंगे तो भी कोई अनर्थ नहीं हो जायगा। अनर्थ तो तब होता है जब हम इस तत्व को पहले की तरह फिर संकीर्ण समझने लग पड़ते हैं। तत्परता से जब कि यह तत्व बार बार स्मृति में लाया ही जा रहा है तब इस प्रकार की विपरीत वृत्ति के जाग उठने का कोई अवसर ही नहीं रह जाता है। जब आन्तरदर्शन पर विश्वास बढ़ता है और बाह्यदर्शन पर से विश्वास उठ चुकता है तब जितने दिनों तक के लिए यह शरीर रचा गया है, उतने दिनों तक बाह्य प्रवृत्ति