पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीप का संक्षेप ५१
विज्ञान बनजाता है, तब शरीरों के किसी भी व्यवहार में लगे रहने पर भी अपनी व्यापकता भूल जाने वाली बात नहीं रहती । वह अवस्था अभ्यास से पकते-पकते जब पूर्ण यौवन पर आती है तब ब्रह्माभ्यासी पुरुष अपने को सर्वत्र परिपूर्ण ज्ञान और आनन्दरूप में पाकर स्वभावतृप्त रहने लग पड़ता है। हमारा जो जीव है वह क्योंकि अन्तःकरण से युक्त है इस कारण से हमें केवल उतने ही भाग के प्रत्यक्ष होने की बात तो समझ में आती है, परन्तु अन्तःकरण से रहित जो सर्वत्र व्यापक महा- चेतना है, उसका हमें कभी प्रत्यक्ष हो सकेगा, यह बात जिनकी समझ में न आती हो वे इस पर यों विचार करें-दो गुरु शिष्यों में से गुरु के कान में कुण्डल पहने हुए हों तथा शिष्य के कान में कुण्डल न हों। अब हमें उन दोनों का पृथक् पृथक् परिचय देने में एक का चिह्न तो कुण्डल का होना बताना पड़ेगा तथा दूसरे शिष्य का चिह्न कुण्डल न होना ही बताना पड़ेगा कि जिसके कान में कुण्डल नहीं है वही शिष्य है। यों जैसे किसी वस्तु का 'होना' लक्षण हो सकता है वैसे ही किसी वस्तु का 'न होना' भी लक्षण हो सकता है। इसी प्रकार 'अन्तःकरण का होना' जीव- भाव की पहचान है तथा 'अन्तःकरण का न होना' या न रहना ब्रह्मभाव की पहचान मानी जाती है। यही कारण है कि कभी तो वेदान्त सच्चिदानन्द आदि धर्मों से उसका प्रतिपादन करते हैं और कभी नेतिनेति की निषेध प्रक्रिया से उसका वर्णन करने लग पड़ते हैं। जब हम अपने चिदात्मा पर से अपने अन्तःकरण का बन्धन (किंवा पाबन्दी) उठा सकेंगे, तब यही हमारी अब की क्षुद्र चेतना, व्यापक चेतना के रूप में, किंवा ब्रह्म के रूप में, प्रकट होकर रहेगी। इस स्वयंप्रकाश चेतन के दर्शन के लिए, हमको केवल