भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१७८ पञ्चदशी

की जहां समाप्ति हो जाती है, वहीं जाकर इस [ अन्तर्यामी ] को अनुमान से ढूँढ लेना चाहिये । द्वित्रान्तरत्वकक्षाणां दर्शनेऽप्ययमान्तरः । न वीक्ष्यते, ततो युक्तिश्रुतिभ्यामेव निर्णयः ॥१६७॥ आन्तर भाव की दो तीन कक्षायें लौकिक [बाह्य] पटादि पदार्थों में दीख भी जायें, परन्तु यह अन्तर्यामी तो आन्तर [अन्दर का] होने से दीखता नहीं है । इस कारण युक्ति और श्रुति के सहारे से ही इसकी सत्ता का निर्णय करना पड़ता है । [ कोई भी अचेतन पदार्थ किसी चेतन अधिष्ठाता के बिना प्रवृत्त नहीं हुआ करता, यह युक्ति अन्तर्यामी को सिद्ध कर देती है । ] पटरूपेण संस्थानात् पट स्तन्तो र्वपुर्यथा । सर्वरूपेण संस्थानात् सर्वमस्य वपुस्तथा ॥१६८॥ पट रूप में आ जाने पर वह पट, उस तन्तु का शरीर माना जाता है । इसी प्रकार सर्व रूप से स्थित हो जाने के कारण, यह सब जगत्, उस अन्तर्यामी का देह माना गया है [ यही बात 'यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरम्' [बृ०३-७-१५] इस श्रुति में कही गयी है । ] तन्तोः संकोचविस्तारचलनादौ पटस्तथा । अवश्यमेव भवति, न स्वातन्त्र्यं पटे मनाक् ॥१६९॥ तथान्तर्याम्ययं यत्र यया वासनया यथा । विक्रियेत तथावश्यं भवत्येव न संशयः ॥१७०॥ तन्तु को जब सकोड़ा जाय, फैलाया जाय, या चलाया जाय, तो पट में भी अवश्य ही संकोच, विस्तार, या चलन