पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १७७
चोरी करने को उकसाता है, मालिक को सावधान रहने की प्रेरणा किया करता है। बहादुर से तोप के मुँह में सिर दे देने को कहता है। भीरु को भाग जाने.की सम्मति देता है। यों सब जीवों की कर्म की डोर को अन्दर बैठा ही बैठा हिलाता रहता है। वहीं से सब पर शासन किया करता है। बुद्धौ तिष्ठन्नान्तरोऽस्या धियानीक्ष्यश्च धीवपुः । धियमन्तर्यमयतीत्येवं वेदेन घोषितम् ॥१६४॥ वह अन्तर्यामी बुद्धि के अन्दर रहता है। बुद्धि उसको देख नहीं सकती। बुद्धि ही उसका शरीर है। वह अन्दर रह कर इस बुद्धि को नियम में रख रहा है। अन्तर्यामी का ऐसा वर्णन यो विज्ञाने तिष्ठन् [ बृ० ३-७-२२ ] इत्यादि श्रुतियों ने स्वयमेव किया है। तन्तुः पटे स्थितो यद्वदुपादानतया तथा । सर्वोपादानरूपत्वात् सर्वत्रायमवस्थितः ॥१६५॥ जिस प्रकार तन्तु उपादानरूप से पट में स्थित रहता है, इसी प्रकार सब का उपादान होने से यह [ अन्तर्यामी ] सब जगह स्थित हो रहा है। यह बात यः सर्वेषु तिष्ठन् [ बृ० ३-७-१५ ] इत्यादि श्रुति में कही गयी है। पटादप्यान्तरस्तन्तु स्तन्तोरप्यंशुगन्तरः । आन्तरत्वस्य विश्रान्ति र्यत्रासावानुमीयताम् ॥१६६॥ उपादान रूप से यद्यपि वह सर्वत्र विराज रहा है, परन्तु उसका सर्वान्तर होना ही उसे उपलब्ध नहीं होने देता। यही बात इस श्लोक में कही गयी है—देखो, पट से अन्दर तन्तु होता है। तन्तु से भी आन्तर.अंशु होता है। इस आन्तरपने