पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 194, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the accurate transcription of the text in Devanagari with line markers:
१७६ पञ्चदशी अशेषप्राणिबुद्धीनां वासनास्तत्र संस्थिताः । ताभिः क्रोडीकृतं सर्वं तेन सर्वज्ञ ईरितः ॥१६१॥ सुषुप्ति काल के उस अज्ञान में [ जो कि सब का कारण है ] सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वासनायें निवास किये रहती हैं। उन सूक्ष्म वासनाओं ने इस सब जगत् को ही अपना विषय बना रक्खा है, इस कारण से उसको सर्वज्ञ कह दिया जाता है । [तात्पर्य यह है,कि सम्पूर्ण बुद्धियों की वासना वाला अज्ञान उस आनन्दमय की उपाधि है इसी से उसको सर्वज्ञ कहते हैं। ऐसा सर्वज्ञ यदि उसको समझें तो फिर उसकी सर्व- ज्ञता पर आक्षेप करने की कोई बात ही नहीं रह जाती । ] वासनानां परोक्षत्वात् सर्वज्ञत्वं न हीक्ष्यते । सर्वबुद्धिषु तद् दृष्ट्वा वासनास्वनुमीयताम् ॥१६२॥ उसकी उपाधि रूपी जो वासनायें हैं, वे तो सदा परोक्ष ही रहती हैं। इसी कारण उसकी सर्वज्ञता का अनुभव किसी को भी नहीं होता । परन्तु सम्पूर्ण बुद्धियों [ को मिला कर फिर उन] में सर्वज्ञता को देखकर, वासनाओं में भी सर्वज्ञता को अनु- मान से ही जान लेना चाहिये । विज्ञानमयमुख्येषु कोशेष्वन्यत्र चैव हि । अन्तस्तिष्ठन् यमयति तेनान्तर्यामितां व्रजेत् ॥१६३॥ विज्ञानमय आदि कोशों के तथा पृथिव्यादि भूतों के अन्दर बैठकर, इन सब को नियम में रखता रहता है, इसी से उसको 'अन्तर्यामी' [अन्दर रहकर नियमन करने वाला] कहा जाता है। यही अन्तर्यामी प्राणियों के पूर्व कर्मों के अनुसार चोर से,