भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चिदाभास तो माया के अधीन होता है। महेश्वर को श्रुतियों में मायी अर्थात् माया का स्वामी कहा है। वह महेश्वर ही अन्त- र्यामी है, वही सर्वज्ञ है, तथा वही इस जगत् का मूल कारण भी है। सौषुप्तमानन्दमयं प्रक्रम्यैवं श्रुतिर्जगौ । एष सर्वेश्वर इति सोयं वेदोक्त ईश्वरः ॥१५८॥ सुषुप्ति के समय, अपने शुद्धरूप में प्रकट होनेवाले, आनन्द मय के विषय में सुषुप्तस्थाने एकीभूतः प्रज्ञानघनः मा. ५ इत्यादि श्रुति ने कहा है कि यही 'सर्वेश्वर' है। यों यह कहा जा सकता है कि बुद्धिवासनाओं में प्रतिबिम्ब रूप यह आनन्दमय ही वेदोक्त ईश्वर तत्व है। सर्वज्ञत्वादिके तस्य नैव विप्रतिपद्यताम् । श्रौतार्थस्यावितर्क्यत्वान्मायायां सर्वसंभवात् ॥१५९॥ इस आनन्दमय की सर्वज्ञता आदि [ यद्यपि अनुभव में आने वाली बात नहीं है, तो भी उस ] में शंका नहीं करनी चाहिये। क्योंकि श्रुति का बताया हुआ पदार्थ अवितर्क्य होता है। इसके अतिरिक्त माया में तो इतना सामर्थ्य है ही कि उसमें सब कुछ संभव हो जाता है। अयं यत् सृजते विश्वं तदन्यथयितुं पुमान् । न कोपि शक्तस्तेनायं 'सर्वेश्वर' इतीरितः ॥१६०॥ देखो यह 'आनन्दमय' जिस [ मानस सृष्टि किंवा जिस जाग्रदादि] जगत् को उत्पन्न कर लेता है, उसको कोई भी पुरुष अन्यथा नहीं कर सकता। यही कारण है कि उसको 'सर्वे- श्वर' कहा गया है। [उस आनन्दमय की सर्वेश्वरता का यही अभिप्राय समझना चाहिये।]