पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ पञ्चदशी तक यह प्रकृति उसे भोग देती है जब यह पुरुष भोगों से उकता जाता है, विवेकी हो जाता है, तब यही उसे अपवर्ग अर्थात् मुक्ति दे देती है ] असङ्गायाश्चिते र्बन्धमोक्षौ भेदाग्रहान्मतौ । बन्धमुक्तिव्यवस्थार्थं पूर्वेषामिव चिद्भिदा ॥११०॥ यद्यपि चिति असंग ही है। परन्तु भेदाग्रह के कारण बंध भी जाती है और मुक्त भी हो जाती है। बन्ध और मुक्ति की व्यवस्था के लिये ये सांख्य भी पहलों [नैयायिकों, प्राभाकरों, भाट्टों] की तरह चेतनों का भेद मानते हैं। प्रश्न यह था कि चिति जब असंग है और प्रकृति तथा पुरुष अत्यन्त विविक्त है, फिर विचारी प्रकृति की प्रवृत्ति से असंग पुरुष को भोग और अपवर्ग कैसे होगये ? इसका उत्तर यह है कि—प्रकृति और पुरुष के भेद को ग्रहण न करने से भोग और अपवर्ग [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही हो गये हैं। महतः परमव्यक्तमिति प्रकृति रुच्यते । श्रुतावसङ्गता तद्वदसङ्गो हीत्यतः स्फुटा ॥१११॥ महतः परमव्यक्तम् [ कठ० ३-११ ] इस श्रुति में प्रकृति के होने का वर्णन है। असङ्गो ह्ययं पुरुषः [ बृ० ४-३-१५ ] इस श्रुति में पुरुष की असंगता का प्रतिपादन किया गया है। चित्सन्निधौ प्रवृत्तायाः प्रकृतेर्हि नियामकम् । ईश्वरं ब्रुवते योगाः स जीवेभ्यः परः श्रुतः ॥१०२॥ [ जीव के विषय में ही नहीं ईश्वर विषय में भी वादियों के बड़े उलटे सीधे विचार हैं। उन्हीं को अब दिखाया जाता