पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 175, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १५७ एक जडता का स्मरण सोकर उठे हुए पुरुषों को होता है । सो यह स्मरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सुषुप्ति काल की जडता को उसने अनुभव न किया हो [ बस इसी से उस समय की जड़ता का अनुभव मान लिया जाता है । ] द्रष्टुर्दृष्टेरलोपश्च श्रुतः सुप्तौ ततस्त्वयम् । अप्रकाशप्रकाशाभ्यामात्मा खद्योतवद् युतः ॥९७॥ नहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते अविनाशित्वात् [बृह० ४-३-२३] इस श्रुति में कहा है कि द्रष्टा आत्मा की जो स्वरूपभूत दृष्टि है उसका लोप कभी नहीं होता । क्योंकि वह दृष्टि विनाश- रहित स्वभाव वाली है । इस प्रमाण से भी यही सिद्ध होता है कि यह आत्मा खद्योत के समान प्रकाश और अप्रकाश [ स्फुरण और अस्फुरण ] दोनों ही से युक्त है । निरंशस्योभयात्मत्वं न कथंचिद्घटिष्यते । तेन चिद्रूप एवात्मेत्याहुः सांख्यविवेकिनः ॥९८॥ निरंश [ निरवयव ] पदार्थ किसी प्रकार भी उभय रूप नहीं हो सकता । इस कारण सांख्यविवेकी यह मानते हैं कि आत्मा तो केवल चिद्रूप ही है । जाड्यांशः प्रकृते रूपं विकारि त्रिगुणं च तत् । चितो भोगापवर्गार्थं प्रकृतिः सा प्रवर्तते ॥९९॥ [जाड्य का जो स्मरण उठे हुए पुरुषों को होता है उस स्मरण में] जो जाड्य भाग है वह तो प्रकृति का रूप है । वह विकारी है । वह सत्व रज तम इन त्रिगुणात्मक है । चेतन पुरुष को भोग और अपवर्ग दिलाने के लिये वह प्रकृति प्रवृत्त हुआ करती है ।