भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १४७ प्रत्यक्षत्वेनाभिमतांधीं देहातिरेकिणम् । गमयेदिन्द्रियात्मानं वच्मीत्यादिप्रयोगतः ॥६३॥ अहं वच्मि अहं पश्यामि=मैं बोलता हूँ मैं देखता हूँ इत्यादि प्रयोगों से प्रतीत होता है कि प्रत्यक्ष मानी हुई यह अहंबुद्धि, देह से भिन्न इन्द्रियों को आत्मा बता रही है । वागादीनामिन्द्रियाणां कलहः श्रुतिषु श्रुतः । तेन चैतन्यमेतेषा मात्मत्वं तत एव हि ॥६४॥ श्रुतियों में वाणी आदि इन्द्रियों का कलह सुना गया है । इस कारण ये इन्द्रियाँ चेतन है । चेतन होने के कारण ही ये इन्द्रियां आत्मा भी हैं । हैरण्यगर्भाः प्राणात्मवादिनस्त्वेवमूचिरे । चक्षुराद्यक्षलोपेऽपि प्राणसत्वे तु जीवति ॥६५॥ प्राणात्मवादी हैरण्यगर्भ तो यह कहते हैं कि चक्षु आदि इन्द्रियाँ जब टूट फूट भी जाती हैं, तब भी प्राण के रहने पर जीता ही रहता है, इस कारण प्राण ही आत्मा है । प्राणो जागर्ति सुप्तेऽपि प्राणश्रैष्ठ्यादिकं श्रुतम् । कोशः प्राणमयः सम्यग्विस्तरेण प्रपञ्चितः ॥६६॥ प्राणादय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति (प्रश्न ४-३) इसमें कहा गया है कि सो जाने पर भी प्राण जागता रहता है । तदेदुक्थम् (छा० १-७-५) इसमें प्राण को श्रेष्ठ बताया गया है । अन्यो- ऽन्तर आत्मा प्राणमयः (तै० २-२) इसमें प्राणमय कोश का कथन विस्तार से किया गया है। यों प्राण को आत्मा सिद्ध करने वाले अनेक श्रौत लिंग हैं ।