भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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१४८ पञ्चदशी मन आत्मेति मन्यन्त उपासनपरा जनाः । प्राणस्याभोक्तृता स्पष्टा भोक्तृत्वं मनसस्ततः ॥६७॥ उपासना करने वाले मन को ही आत्मा मानते हैं। क्योंकि प्राण का अभोक्ता पन तो सबको विदित ही है। इस कारण मन ही भोक्ता है (और वही आत्मा है)। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । श्रुतो मनोमयो कोश स्तेनात्मेतीरितं मनः ॥६८॥ मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (तै० २-३) इस श्रुति में मनोमय कोश का वर्णन भी आता है। इसी से मन को आत्मा कहा जाता है। विज्ञान मात्मेति पर आहुः क्षणिकवादिनः । यतो विज्ञानमूलत्वं मनसो गम्यते स्फुटम् ॥६९॥ दूसरे क्षणिकवादी बौद्ध लोग विज्ञान को ही आत्मा कहते हैं। क्योंकि यह मन विज्ञानमूलक है, यह तो सभी को प्रत्यक्ष होता है। अहंवृत्ति रिदंवृत्ति रित्यन्तःकरणं द्विधा । विज्ञानं स्यादहंवृत्ति रिदंवृत्तिर्मनो भवेत् ॥७०॥ अन्तःकरण दो प्रकार का होता है—एक 'अहंवृत्ति' दूसरा 'इदंवृत्ति'। विज्ञान अर्थात् बुद्धि को 'अहंवृत्ति' कहते हैं, मन को 'इदंवृत्ति' कहा जाता है। इस प्रकार एक होने पर भी वृत्ति- भेद के कारण 'मन' और 'विज्ञान' कहाने लगता है।