भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१५ चात्मवित् (छा० ७-१-३) इस श्रुति में कहा गया है कि देश- काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित आत्मतत्व को जान लेने वाला पुरुष शोक अर्थात् इस अज्ञानमूलक संसार समुद्र को लांघ जाता है । रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति (तै०२-७) इस श्रुति में कहा गया है कि जिसको कहीं पर 'ब्रह्म' और कहीं पर 'आत्मा' कहा जाता है वह यह आत्मा रस किंवा सार अथवा आनन्दरूप है,उस आनन्दरूप ब्रह्म को पाकर [ मैं ब्रह्म हूँ इस ज्ञान से प्राप्त करके] आनन्दी हो जाता है—मर्यादा- रहित और सर्वाधिक सुख को पा लेता है। ब्रह्मात्मैकत्व ज्ञान को छोड़ कर किसी भी दूसरे साधन के अनुष्ठान से आनन्दी नहीं हो सकता। इन सब वाक्यों से यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान से अनिष्ट की निवृत्ति होती है और इष्ट की प्राप्ति होती है। प्रतिष्ठां विन्दते स्वस्मिन् यदा स्यादथ सोऽभयः। कुरुतेऽस्मिन्नन्तरं चेदथ तस्य भयं भवेत् ॥३॥ जब अपने आपे में प्रतिष्ठा पा लेता है तब वह अभय हो जाता है। जब इसमें भेद कर बैठता है फिर उसे भय लगने लगता है। यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्ये ऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ऽथ सोऽभयं गतो भवति (तै ०२-७) इस श्रुति में कहा गया है कि जिस समय यह मुमुक्षु इन्द्रियों से न दीखने वाले, स्वरूप होने के कारण अपना न कहा सकने वाले, शब्दों से न कहे जाने वाले, किसी के आश्रय में न रहने वाले, अपनी ही महिमा में ठहरने वाले, विद्वानों के अनुभव में आने वाले, इस आत्मा में अभय अर्थात् भेद रहित होकर, प्रतिष्ठा अर्थात् अपनी ब्रह्म