पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२४ पञ्चदशी का कारण यह था कि] वेदाभ्यास से पहले पहले तो आध्यात्मिक आदि तीन ताप ही इसे शोकी रखते थे। अब तो उसे इन वेदों का अभ्यास करना पड़ता है। इनके भूलने का डर बना रहता है। पराजय की शंका लगी रहती है। अपने से थोड़े पढ़े को देखकर गर्व भी हो जाता है। यों वेद पढ़ने के बाद उसके शोक के कारण बढ़ गये हैं। सोऽहं विद्वन् प्रशोचामि शोकपारं नयात्र माम् । इत्युक्तः सुखमेवास्य पारमित्यभ्यधादृषिः ॥२०॥ [नारद ने स्वयं अपने मुख से यह बात कही है कि] हे विद्वन् ! वह मैं शोक में फंसा पड़ा हूँ। उस मुझको आप शोक से पार कर दीजिये। यों जब उसने शोक की निवृत्ति का उपाय बूझा था तब सनत्कुमार ऋषि ने अपने जाने हुए] सुखरूप ब्रह्म को ही शोकनिवृत्ति का उपाय बता दिया था। [उसने कहा था कि सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यम् (छा. ७-२२-१) यदि शोक का पार पाना है तो सुख को ही जान लो कि सुख क्या तत्व है ? सुख को जान लेने पर शोक करने का प्रसंग नहीं आयेगा । सुख तत्व को न समझने के कारण ही संसारी प्राणी उसे विषयों में तलाश करते हैं। यदि वे सुख तत्व को समझ जांय तो उनकी सुख की बाह्य मांग बन्द हो जाय और वे शोक- सागर को एक क्षण में पार कर सकें। यही उस ऋषि का अभिप्राय था] सुखं वैषयिकं शोकसहस्रेणावृतत्वतः । दुःखमेवेति मत्वाऽह नाल्पेऽस्ति सुखमित्यसौ ॥२१॥ सनत्कुमार मुनि ने जब यह कहा था कि 'अल्प में सुख