भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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नहीं है' तब उन्होंने यह समझ कर ही कहा था कि—वैषयिक [विषयों की मार्फत मिले हुए] सुख हज़ारों शोकों से आच्छा- दित रहते हैं, इस कारण वे तो एक प्रकार के दुःख ही हैं। वैषयिक सुखरूपी मांस के टुकड़े पर हज़ारों शोकरूपी गीधों और बाघों के दांत लगे रहते हैं—वे उस पर सदा मंड- राते रहते हैं और उसे नोच नोच कर खाते रहते हैं। इस कारण वैषयिक सुख को सुख कहना ही भूल है। वह तो एक प्रकार दुःख ही है। वह तो ऐसा है जैसे किसी को खाज में ही आनन्द आता हो। उसको तो सुख के वेश में आने वाला दुःख ही मानना चाहिये। ननु द्वैते सुखं मा भूदद्वैतेऽप्यस्ति नो सुखम् । अस्ति चेदुपलभ्येत तथा च त्रिपुटी भवेत् ॥२२॥ अच्छा यह तो मान लिया कि द्वैत में सुख नहीं है। परन्तु हमें तो दीखता है कि अद्वैत में भी सुख नहीं है। यदि अद्वैत में सुख होता तो वह [विषयसुखादि की तरह] उपलब्ध होना चाहिये था [उपलब्ध न होने से मानते हैं कि अद्वैत में भी सुख नहीं है] यदि कोई कहने लगे कि अद्वैत में तो सुख की उप- लब्धि होती है तो उससे कहो कि फिर तो त्रिपुटी बन जायगी [और अद्वैत नहीं रह सकेगा। तब तो अनुभवित्ता अनुभव और अनुभाव्य ये तीन आकार मानने ही पड़ेंगे और अद्वैत का नाश हो जायगा।] मास्त्वद्वैते सुखं किन्तु सुखमद्वैतमेव हि । किं मानमिति चेन्नास्ति मानाकांक्षा स्वयंप्रभे ॥२३॥