पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४३० पञ्चदशी अन्धः सन्नप्यनन्धः स्याद्विद्धोऽविद्धोऽथ रोग्यपि। अरोगीति श्रुतिः प्राह, तच्च सर्वे जना विदुः ॥३४॥ तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वान्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवति उपतापी सन्ननुपतापी भवति (छ. ८-४-२) तद्यद्यपीदं भगवः शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति (छ. ८-१०-३) इस श्रुति में कहा गया है कि—सुषुप्ति के आ जाने पर अन्धा अन्धा नहीं रहता, ज़खमी ज़खमी नहीं रहता, रोगी अरोगी हो जाता है। [अर्थात् देहाभिमान के कारण उत्पन्न हुए दोष सुषुप्ति में भाग जाते हैं] इस बात को सब लोग ही जानते हैं [कि—रोग से पीडित भी पुरुष को जब सुषुप्ति आ जाती है तब उसे उस के दुःख का अनुभव नहीं होता।] न दुःखाभावमात्रेण सुखं लोष्टशिलादिषु । द्वयाभावस्य दृष्टत्वादितिचेद् विषमं वचः ॥३५॥ केवल दुःख के न होने से ही सुख की कल्पना करना ठीक नहीं है। देखा जाता है कि—ढेले और पत्थर आदि में दोनों का ही अभाव होता है [उन में जहां दुःख नहीं है, वहां उनमें सुख भी तो नहीं है] इस का उत्तर यह है कि तुम्हारा दृष्टान्त दाष्टन्तिक के अनुसार नहीं है] मुखदैन्यविकासाभ्यां परदुःखसुखोहनम् । दैन्याद्यभावतो लोष्टे दुःखाद्यूहो न संभवेत् ॥३६॥ [दाष्टन्तिक के अनुसार न होने की बात भी देख लो कि] दूसरे के दुःख और दूसरे के सुख की ऊहना उस के मुख की दीनता और उसके मुख के विकास को देख कर ही तो की जाती है