पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 623, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्यविवेक का संक्षेप ३५
उसी गुप्त एकता का ग्रहण असि [ है ] यह पद करा रहा है। परन्तु कितना ही प्रयत्न करो इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी लोगों की ही उदार दृष्टि पहुँचेगी । दूसरे अनधिकारी लोग तो इस महावार्ता को हँसी में ही टाल देंगे और परम पद के साथ खिल- वाड़ कर बैठेंगे । मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि 'तत्' 'त्वं' पदों की जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है, उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें, और वैसा अनुभव करके अनादिकाल की इस वृथा खटपट को भूल जांय । वे अनुभव करें कि क्या हम अनादि काल से इसी भवजाल में उलझे रहने को यहां उतरे हैं ? क्या इस संसार की वेमतलब उखाड़ पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य है ? या हमारा अपना कोई स्थायी रूप भी है ? जिसके कि आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैं। इसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर तत्त्वमसि [ तुम तो वह हो, तुम्हें तो इस खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीं है ] यह महावाक्य दे रहा है । अयमात्मा ब्रह्म जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष हो रहा है परन्तु हुआ करो, फिर भी मायामोहित प्राणी ने इस स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी उपेक्षा की है जैसी कदाचित् शत्रुओं की भी कोई न करता हो। कोटिजन्मों के पुण्यों के परिपाक से जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम अयम् [यह] कह रहे हैं-अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीं है और यह कभी किसी का दृश्य नहीं होता है। अहंकार,प्राण,मन इन्द्रिय तथा देह का जो समूह है, उस सभी का अधिष्ठान, सभी क