भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[६] चित्रदीप का संक्षेप तसवीर वाले कपड़े की जैसे चार अवस्थायें हैं—धुला हुआ, मांडी लगाया हुआ, चिह्न किया हुआ और रंगभरा हुआ, इसी प्रकार परमात्मा में भी चार अवस्थायें हैं ( १ ) चेतन ( २ ) अन्तयोमी ( ३ ) सूत्रात्मा ( ४ ) तथा विराट् । खयं तो वह चेतन है, माया का ध्यान करें तो वह 'अन्तर्यामी' है, सूक्ष्म सृष्टि को देखें तो वह 'सूत्रात्मा' कहाता है, स्थूल सृष्टि पर दृष्टि डालें तो उसे विराट् कहना होगा । जो देव मनुष्य पशु आदि के शरीर चैतन्य में अध्यस्त हैं, उनमें जीव नाम के जो चिदा- भास पड़े हैं ये ही तो संसार में भ्रमण कर रहे हैं । चेतनतत्व व्यापक है, पर है, अखण्ड है, वह तो संसार भ्रमण कर ही नहीं सकता । जीव के संसार को ही जो कि चेतन का संसार समझते हैं वे सब भूलते हैं । चिदाभास के विषय में ज्ञातव्य बात यह है कि—देहों में ही चिदाभास पड़ता है, मिट्टी पत्थर आदि में चिदा- भास नहीं पड़ता । जीवभाव अविद्या के कारण उत्पन्न होता है । दीखनेवाला संसार 'परमार्थ है, सब अपने आपे में लगे हैं, ऐसा सम- झना ही 'अविद्या' है—यही बेसमझी है। यह संसार जीव का है 'आत्मतत्व का संसार हो ही नहीं रहा, ऐसा ज्ञान 'विद्या' कहाती है। यह विद्या विचार करते रहने से हाथ आजाती है । उसको पाने के लिए जगत्, जीव और परात्मा का विचार सदा ही करना चाहिये । जीवभाव और जगत् भाव जब हट जायगा, तब आत्मा ही आत्मा