भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 726 में से

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ब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप ९५ आता ही नहीं। जब तक कोई इस ब्रह्ममार्ग का भेदिया साथ न हो तब तक ब्रह्मदुर्ग पर अधिकार पाना सरल काम नहीं है। प्रकृत बात तो यही हुई कि जहां जहां विषय न हों और सुख होता हो वहां वहां इस ब्रह्मानन्द की 'वासना' को समझ लो। विषयों के मिलने पर भी, जब कि उनकी इच्छा नहीं रह जाती और मनोवृत्ति अन्तर्मुख हो जाती है, तब उसमें आनन्द का प्रति- बिम्ब पड़ जाता है। बस इसी को 'विषयानन्द' जान लो। 'ब्रह्मा- नन्द' 'वासनानन्द' और 'प्रतिबिम्ब' [विषयानन्द] इन तीन के सिवाय तो इस जगत् में चौथा आनन्द है ही नहीं। इन तोनों आनन्दों में भी यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यह स्वयं- प्रकाश 'ब्रह्मानन्द' ही 'वासनानन्द' और 'विषयानन्दों' को यदा तदा उत्पन्न कर देता है। यहां तक श्रुति, युक्ति और अनुभव के सहारे से यह सिद्ध किया गया है कि सुषुप्ति काल में यह स्वयंप्रकाश और चेतन ब्रह्मानन्द रहता है। अब जागरण काल में उस ब्रह्मानन्द को कैसे जानें ? सो भी सुन लीजिए—सुषुप्ति के समय जिस 'आनन्द- मय' को हमने ऊपर बताया है, वही जब 'विज्ञानमय' हो जाता है तब स्थानभेद के, कारण कभी जागरण और कभी स्वप्न में पहुँच जाता है। नेत्र में 'जागरण' होता है, कण्ठ में 'स्वप्न' होता है और हृदय कमल में 'सुषुप्ति' होती है। यह चेतन जब जागता है तब पैरों से मस्तकपर्यन्त देह को व्याप्त कर लेता है। तपे हुए लोहपिण्ड के साथ जैसे अग्नि हिल मिल कर एक होजाती है, इसी प्रकार इस देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त हुआ यह चेतन, निश्चित रूप से यह मान बैठता है कि 'मैं तो मनुष्य हूँ'। यह मनुष्य क्रम से 'उदासीन' 'सुखी' और 'दुःखी' इन तीन अव-

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