पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९६ पञ्चदशी
स्थाओं में रहने लगता है। इन तीनों अवस्थाओं में से सुख दुःख की दो अवस्थायें कर्म से उत्पन्न हुआ करती हैं। परन्तु उदासी- नता तो किसी भी कर्म से उत्पन्न नहीं होती [ वह तो स्वाभाविक ही होती है ]। बाह्य पदार्थों के भोग से या फिर मनोराज्य से भिन्न भिन्न प्रकार के सुख दुःख होते हैं। परन्तु कभी कभी ऐसा भी होता है कि उस समय न तो सुख ही होता है और न दुःख ही। उस समय निजानन्द की धुंधली प्रतीति सब ही को होती है। उस समय प्रायः सभी यह कहा करते हैं कि आज मुझे कुछ भी चिन्ता नहीं है। आज तो मैं सुखपूर्वक बैठा हूँ। 'मैं सुखपूर्वक' हूँ' इस प्रकार सूक्ष्म अहंकार से ढका रहने के कारण ही इस आनन्द को हम मुख्यानन्द नहीं कह सकते। इसे तो मुख्य आनन्द की वासना समझना चाहिए, जो कि अहंकार के छनने में को छन कर हमें अस्पष्ट दीख रही है—जो अपनी ओर को हमारा विशेष ध्यान नहीं खींच सकी है। जिस घड़े के अन्दर जल भर रहा हो उस के बाहर जो शीतलता आजाती है वह शीत- लता जल नहीं होती, किन्तु वह तो जल का गुण होता है। उस शीतलता को देखकर जल का तो अनुमान ही हो जाता है। इसी प्रकार यह उदासीनता का सुख ही 'ब्रह्मानन्द' नहीं है। यह तो 'ब्रह्मानन्द' की वासना है। इस वासना से तो 'ब्रह्मानन्द' का अनु- मान होता है। निरोध समाधिका अभ्यास करने से जितना इस अहंकार का विस्मरण होता जायगा, योगी की दृष्टि उतनी ही सूक्ष्म होने लगेगी और उसी परिमाण से योगी को निजानन्द का अनु- भव भी होने लग पड़ेगा। जब अहंकार का विस्मरण पूर्ण रूप से हो जाता है, तब यह परमसूक्ष्म होकर रहता है—लीन नहीं होता— इस कारण इस अवस्था को निद्रा नहीं कह सकते। यही कारण