पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 685, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मानन्दान्तर्गत योगानन्द का संक्षेप . ९७ है कि साधक का देह गिर नहीं जाता । गीता के छठे अध्याय में भगवान् ने अर्जुन के प्रति कहा है कि—जिस समय द्वैत का भान बन्द हो जाय और नींद भी न आये, उस समय जो सुख किसी को प्रतीत होता हो बस वही ब्रह्मानन्द कहाता है । साधक को चाहिए कि धीर बुद्धि के सहारे से धीरे धीरे मन की उपरति की साधना किया करे और जब मन को आत्मसंस्थ कर चुके—जब मन को यह निश्चय कराया जा चुके कि यह सब कुछ आत्मा ही है, उससे भिन्न यह कुछ भी नहीं है—ऐसी अवस्था जब आजाय फिर सब कुछ सोचना बन्द कर दे । यही योग की अन्तिम स्थिति है । ऐसी उच्च स्थिति पाने की विधि यह है कि—जो मन स्वभाव- दोष से चंचल है अस्थिर है, जो किसी एक विषय के साथ बंध कर कभी नहीं ठहरता, ऐसा मन जिस कारण से बाहर निकला हो, उसकी ओर से उसे रोक कर, उस के दोष उसे दिखा कर, उसे वैराग्य का उपदेश दे दे कर, वहां से हटा ले और आत्मा के बस में करता जाय । इस प्रकार योगाभ्यासी पुरुष का मन अभ्यास के प्रताप से आत्मा में ही शान्त हो जाता है । जब इस योगी का मन शान्त हो जाता है, जब इसका रजोगुण नष्ट हो जाता है, जब वह निष्पाप हो जाता है, तब उसे ब्रह्मभाव की प्राप्ति हो जाती है, तभी उसे उत्तम सुख मिलता है । जिस समय चित्त योगसेवा करते करते रुक कर आराम पा लेता है, जब अपने आप से अपने आप को देख कर मग्न होने लगता है, जिस समय आत्मा में स्थित हुआ योगी अनन्त तथा बुद्धिग्राह्य अतीन्द्रिय और अपूर्व सुख का अनुभव किया करता है, जब वह योगी आत्मतत्व को कभी नहीं भूलता, जिस आत्मा को पाकर दूसरे लाभ तुच्छ दीखने लगते हैं, जहां पहुँच कर योगी दुःखों के पर्वत