पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ पञ्चदशी ही [स्वप्न की तरह] बने रह सकते हैं [तात्पर्य यह है कि विवेक के द्वारा मिथ्यात्व का निश्चय हो जाने पर भी वह विवेक भूमि आदि के स्वरूप का उपमर्दन नहीं कर देता है । इस से व्यवहार के सहसा लुप्त हो जाने का प्रसंग नहीं आता है । विवेक व्यवहार को रोकता नहीं है, विवेक तो केवल सर्वात्म्य को जगाता है । जो काम क्षुद्र देहाभिमान की प्रेरणा से होते थे वे अब सर्वात्म्य की दृष्टि से होने लग पड़ेंगे । यही विवेक हो जाने की पहचान है ।] सांख्यकाणादबौद्धाद्यैर्जगद्भेदो यथा यथा । उत्प्रेक्ष्यते ऽनेकयुक्त्या भवत्वेष तथा तथा ॥१००॥ सांख्य, काणाद तथा बौद्धादि दार्शनिक लोग जिस जिस रीति से जगद्भेद की उत्प्रेक्षा अनेकानेक युक्तियों से करते हैं, यह जगत् वैसा ही रहो [ वैसा वैसा व्यावहारिक भेद तो हम भी मानते ही हैं। इस कारण उन के खण्डन करने का प्रयत्न हम नहीं करते । ] अवज्ञातं सदद्वैतं निःशङ्कैरन्यवादिभिः । एवं का क्षतिरस्माकं तद्द्वैत मवजानताम् ॥१०१॥ प्रमाणसिद्ध सत् अद्वैत की अवज्ञा, अन्य सांख्यादि वादियों ने निःशङ्क होकर की ही है । फिर [ श्रुति युक्ति और अनुभव के बल से चलने वाले ] हम लोग यदि उन के द्वैत की अवज्ञा करते हैं तो इस से हमारी क्या हानि है ? द्वैतावज्ञा सुस्थिता चेदद्वैते धीः स्थिरा भवेत् । स्थैर्ये तस्याः पुमानेष जीवन्मुक्त इतीर्यते ॥१०२॥ [ प्रत्युत उस अवज्ञा से एक महालाभ यह होता है कि ]