भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 726 में से

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पृष्ठ 87

पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ६९ द्वैत की अवज्ञा जब पूर्ण रूप से स्थित हो जाती है, तब साधक की बुद्धि अद्वैत में स्थिर हो जाती है । इस बुद्धि के स्थिर हो जाने पर फिर यह [ स्थिर बुद्धि वाला ] पुरुष 'जीवन्मुक्त' कहाने लगता है । [अर्थात् जीवन्मुक्ति रूपी प्रयोजन के विद्य- मान होने के कारण यह द्वैतापमान कोई निष्प्रयोजन बात नहीं है । हां, उन लोगों का अद्वैतापमान उन के कल्याण मार्ग का घातक अवश्य ही है ] । एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति । स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥१०३॥ ['जीवन्मुक्ति ही नहीं विदेहमुक्ति भी इसी द्वैतावज्ञा का फल है' यह बात भगवद्गीता (२-७२) में कही गई है ] हे पार्थ, यहां तक ब्रह्मनिष्ठा का वर्णन किया गया। [परमेश्वर की आराधना से शुद्ध अन्तःकरण का] मनुष्य जब इस स्थिति को पा लेता है, तब फिर वह कभी संसारमोह को प्राप्त नहीं होता है । यदि अन्तकाल में भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण किंवा लय को पा लेता है । [अथवा मरते समय क्षण भर के लिये भी इस स्थिति में ठहर सके तो वह ब्रह्म में निर्वाण किंवा विदेहमुक्ति को पा लेता है, फिर जो पुरुष बचपन से ही इस स्थिति में रहने लगा हो तो उस का कहना ही क्या है ? ] सदद्वैतेऽनृतद्वैते यदन्योन्यैकवीक्षणम् । तस्यान्तकालस्तद्भेदबुद्धिरेव न चेतरः ॥१०४॥ [भगवद्गीता के उपर्युक्त श्लोक में अन्तकाल शब्द से क्या अभिप्राय है सो अब बताया जाता है] 'सद्रूप अद्वैत' तथा 'अनृतरूप द्वैत' में जो अब तक अन्योन्यैकवीक्षण

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