पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्योन्याध्यासरूपी ऐक्यज्ञान ] हो रहा था उस भ्रमज्ञान का अन्तकाल तो यही है कि उनकी भेदबुद्धि उत्पन्न हो जाय [अर्थात् उन अद्वैत और द्वैत को क्रम से सत्य और अनृत समझ लिया जाय]। इस श्लोक में अन्तकाल शब्द का अभि- प्राय वर्तमान देहपात से नहीं है । यद्वान्तकालः प्राणस्य वियोगोऽस्तु प्रसिद्धितः। तस्मिन् कालेऽपि न भ्रान्तेर्गतायाः पुनरागमः॥१०५॥ अथवा लोकप्रसिद्धि के अनुसार प्राणों के वियोग को ही अन्तकाल मान लो । उस में भी कोई दोष नहीं है । क्योंकि जो भ्रान्ति उस समय नष्ट हो जायगी वह भ्रान्ति फिर कभी भी लौट कर आने वाली नहीं है । इस लोक तथा परलोक की सन्धि 'मृत्यु' होती है । मृत्यु समय में जिसकी भ्रान्ति नष्ट हो जायगी दूसरे शब्दों में उस की परलोकसामग्री जल कर भस्म बन जायगी। फिर उसे विदेह मुक्ति मिल जानी अत्यन्त सुकर होगी । नीरोग उपविष्टो वा रुग्णो वा विलुठन् भुवि । मूर्च्छितो वा त्यजत्वेष प्राणान् भ्रान्तिर्न सर्वथा ॥१०६॥ [जिस पुरुष की द्वैतावज्ञा स्थित हो गयी हो अथवा जिसे ब्राह्मी स्थिति की प्राप्ति हो चुकी हो फिर] वह चाहे तो नीरोग होकर, चाहे बैठे बैठे, चाहे रोगी रहकर, या भूमि पर पड़े पड़े, अथवा मूर्च्छा अवस्था में प्राणों का त्याग करदे, उसे फिर कभी भी भ्रान्ति नहीं हो सकती [मूर्च्छा आदि में ब्रह्म-विषयक बुद्धिवृत्ति न भी हो तो भी ब्रह्मज्ञान के संस्कार तो रहते ही हैं, उन्हीं से मुक्ति मिलकर रहेगी।]