भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ७१ दिने दिने स्वप्नसुप्त्योरधीते विस्मृतेऽप्ययम् । परेद्युर्नानधीतः स्यात्तद्वद्विद्या न नश्यति ॥१०७॥ स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था के आने पर प्रतिदिन पढ़े हुए पाठ के भूल जाने पर भी, अगले दिन जब वह पाठक उठता है तब अनधीत [अनपढ़] नहीं हो जाता है । इसी प्रकार मरते समय मूर्च्छादि के कारण तत्व का विचार न कर सकने पर भी, ज्ञानी का ज्ञान नष्ट नहीं होता है । [वह संस्कार रूप से तो रहता ही है ।] प्रमाणोत्पादिता विद्या प्रमाणं प्रवलं विना । न नश्यति न वेदान्तात् प्रवलं मानमीक्ष्यते ॥१०८॥ जिस विद्या को प्रमाणों ने उत्पन्न किया है, वह किसी प्रबल प्रमाण के बिना नष्ट नहीं हो सकेगी । वेदान्तों से प्रबल प्रमाण तो कोई देखा ही नहीं जाता । [फिर यह ज्ञान मूर्च्छा आदि में कैसे नष्ट हो सकेगा ?] तस्माद् वेदान्तसंसिद्धं सदद्वैतं न वाध्यते । अन्तकालेऽप्यतो भूतविवेकान्निर्वृतिः स्थिता ॥१०९॥ इससे यही सिद्ध हुआ कि वेदान्तसिद्ध सत् अद्वैत की बाधा अन्तकाल में भी नहीं होगी । इसी से यह कहना सर्वथा ठीक है कि भूतविवेक कर लेने पर ही निर्वृत्ति [किंवा मुक्ति] की स्थिरता हो जाती है । इति श्रीमद्विद्यारण्यमुनिविरचितं पंचभूतविवेकप्रकरणं समाप्तम्