BharatKosha
Back to the archive

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५

Page 387Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६५ हो सकती है जब अपरोक्ष ज्ञान हो जाय [ अपरोक्ष ज्ञान करादेने के अतिरिक्त विचार का कोई भी काम नहीं है ] । विचारयन्नामरणं नैवात्मानं लभेत चेत् । जन्मान्तरे लभेतैव प्रतिबन्धक्षये सति ॥३३॥ मरण पर्यन्त विचार करते रहने पर भी यदि किसी को आत्मा का साक्षात्कार न हो गया हो तो,प्रतिबन्धों के हट जाने पर, दूसरे किसी जन्म में तो उसे साक्षात्कार हो ही जायगा । इह वामुत्र वा विद्येत्येवं सूत्रकृतोदितम् । शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युिरिति श्रुतिः ॥३४॥ ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् (ब्रह्म सू० ३-४-५१)इस सूत्र में व्यास देव ने कहा है कि विचार करने वाले को इस जन्म या दूसरे जन्मों में ब्रह्म ज्ञान हो जाता है । 'शृण्वन्तोऽप्यत्र बहवो यन्न विद्युः' ( क० २-७ ) इस श्रुति में कहा गया है कि प्रतिबन्ध होने पर बहुतों को इस जन्म में ज्ञान नहीं होता । गर्भ एव शयानः सन् वामदेवोऽवबुद्धवान् । पूर्वाभ्यस्तविचारेण यद्वदध्ययनादिषु ॥३५॥ 'गर्भे नु सन्नन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ( ऐतरेय ४- ५ ) इस श्रुति में कहा गया है कि—वामदेव को गर्भवास के दिनों में ही अपरोक्ष ज्ञान हो गया था । इससे यह सिद्ध होता है कि इस जन्म में श्रवणादि कर लेने वाले को दूसरे जन्म में ३४—कोई प्रतिबन्ध न हो तो श्रवण आदि से इस जन्म में भी ज्ञान हो जाता है । प्रतिबन्ध हो तो इस जन्म में न होकर दूसरे जन्मों में होता है । प्रतिबन्ध के साधक प्रमाण देखे जाते हैं । जैसे कि वामदेव को गर्भ में ज्ञान हुआ था । बहुत से तो इस तत्व को सुन कर भी नहीं समझते हैं ।

Page 388Permalink

भी अपरोक्ष ज्ञान होता है। दैनिक व्यवहार में भी देख लो कि—पठन पाठन आदि कामों में पहले अभ्यास किये हुए विचार से कभी कभी अगले दिन बिना ही याद किये स्मरण आ जाता है। बहुवारमधीतेऽपि तदा नायाति चेत् पुनः। दिनान्तरेऽनधीत्यैव पूर्वाधीतं स्मरेत् पुमान् ॥३६॥ बहुत बार याद करने पर भी, उस दिन यदि याद नहीं आता,तो कभी कभी ऐसा होता है कि दूसरे दिन बिना ही याद किये पहले पढ़े हुए पाठ याद आ जाते हैं। कालेन परिपच्यन्ते कृषिगर्भादयो यथा। तद्वदात्मविचारोपि शनैः कालेन पच्यते ॥३७॥ खेती और गर्भ आदि जैसे तुरन्त ही तैयार नहीं हो जाते। किन्तु पकने में इन्हें कुछ समय लगता ही है। इसी प्रकार आत्मविचार भी धीरे-धीरे काल पाकर परिपक्व हुआ करता है। पुनः पुनर्विचारेऽपि त्रिविधप्रतिबन्धतः । न वेत्ति तत्वमित्येतद् वार्तिके सम्यगीरितम् ॥३८॥ बार बार विचार करने पर भी, तीन प्रकार के प्रतिबन्धों के होने से तत्व का साक्षात्कार नहीं हो पाता । यह बात वार्तिककार ने भले प्रकार समझायी है । कुतस्तज्ज्ञानमिति चेत् तद्धि बन्धपरिक्षयात् । असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा ॥३९॥ वार्तिककार ने उन प्रतिबन्धों का निरूपण इन नौ श्लोकों में यों किया है—जो ज्ञान पहले जन्म में उत्पन्न नहीं हो पाया था वह ज्ञान अब इस दूसरे जन्म में किस कारण से उत्पन्न

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७

Page 389Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६७ हुआ करता है ? इसका उत्तर यह है कि प्रतिबन्ध के क्षीण हो जाने से वह ज्ञान हो जाता है। वह प्रतिबन्ध (१) भूत (२) भावी और (३) वर्तमान भेद से तीन प्रकार का होता है। अधीतवेदवेदार्थोऽप्यत एव न मुच्यते । हिरण्यनिधिदृष्टान्तादिदमेव हि दर्शितम् ॥४०॥ किसी प्रतिबन्ध के होने से ही वेद के ज्ञाता लोग भी मुक्त नहीं हो पाते 'तद्यथा हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि संचरन्तो न विन्देयुः एवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरह र्ब्रह्मलोकं गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः' [छा० ८-३-२] भूगर्भविद्या को न जानने वाले लोग, हिरण्यनिधि के ऊपर घूमते भी रहते हैं, परन्तु उसे पा नहीं सकते। इसी प्रकार ये सारी प्रजायें प्रति दिन ब्रह्म के पास जाती हैं परन्तु विषयवासना रूपी अनृत से ढकी रहने के कारण उसको पा नहीं सकती ।] हिरण्य- निधि के दृष्टान्त से इस प्रतिबन्ध को ही दिखाया गया है। अतीतेनापि महिषीस्नेहेन प्रतिबन्धतः । भिक्षुस्तत्त्वं न वेदेति गाथा लोके प्रगीयते ॥४१॥ भूत प्रतिबन्धक को लोक में देखलो कि बीते हुए महिषी के स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण भिक्षु ने तत्व को नहीं जाना था। यह गाथा वेदान्त संप्रदाय में प्रसिद्ध है । [कोई यति पहले गृहस्थ आश्रम में किसी भैंस पर बड़ा प्रेम रखता था। इसी बीच में उसने संन्यास लेलिया। वेदान्तका श्रवण करने पर भी उसी महिषी स्नेह से उत्पन्न हुए प्रतिबन्ध के कारण गुरु से कही हुई बात उसकी समझ में नहीं आयी थी।

Page 390Permalink

३६८ पञ्चदशी अनुसृत्य गुरुः स्नेहं महिष्यां तत्व मुक्तवान् । ततो यथावद् वेदैष प्रतिबन्धस्य संक्षयात् ॥४२॥ गुरु ने उसके महिषी स्नेह का अनुसरण करके महिषी में [रूपी उपाधि में] ही तत्व [ ब्रह्म ] बतादिया था । तब उसने महिषी की उपासना की और उपासना करते करते जब उसके [महिषीस्नेह रूपी] प्रतिबन्ध का क्षय होगया तब वह पूर्ण रूप से ज्ञानी हो गया था । प्रतिबन्धो वर्तमानो विषयासक्तिलक्षणः । प्रज्ञामान्द्यं कुतर्कश्च विपर्ययदुराग्रहः ॥४३॥ वर्तमान प्रतिबन्धों में से पहला तो विषयासक्ति है । दूसरा प्रज्ञा की मन्दता है । तीसरा कुतर्क है [जिसके कारण श्रुति के अर्थ की अन्यथा ऊहना की जाती है] चौथा प्रति- बन्ध अपने विपरीत ज्ञान पर दुराग्रह करते जाना है । [आत्मा कर्ता भोक्ता है, यह विपरीत ज्ञान कहाता है । इस बात पर बिना युक्ति के डटे रहना चौथा प्रतिबन्ध है । [इन चारों में से कोई भी एक हो तो ज्ञान का उदय नहीं होता । ] शमाद्यैः श्रवणद्यैश्च तत्रतत्रोचितैः क्षयम् । नीतेऽस्मिन् प्रतिबन्धेऽतः स्वस्य ब्रह्मत्वमश्नुते ॥४४॥ शम दम उपरति आदि तथा श्रवण मनन निदिध्यासनों में से जो जो जिस जिस प्रतिबन्ध को हटा सकते हों, उन उन से उस उस प्रतिबन्ध के नष्ट कर दिये जाने पर, अपने आपही अपने ब्रह्मभाव की प्राप्ति होजाती है । आगामिप्रतिबन्धश्च वामदेवे समीरितः । एकेन जन्मना क्षीणो, भरतस्य त्रिजन्मभिः ॥४५॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६९

Page 391Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३६९ जन्मान्तर दिलाने वाला आगामी प्रतिबन्ध [जिसे कि प्रारब्धशेष भी कहते हैं, वह भोग के बिना निवृत्त हो ही नहीं सकता। इस कारण उसकी निवृत्ति का काल भी नियत नहीं किया जा सकता। वह प्रतिबन्ध] एक जन्म में तो वामदेव का क्षीण हो पाया था। भरत का तो [नृप-मृग और जड भरत इन] तीन जन्मों में क्षीण होसका था। योगभ्रष्टस्य गीतायामतीते बहुजन्मनि । प्रतिबन्धक्षयः प्रोक्तो न विचारोऽप्यनर्थकः॥४६॥ जो योगभ्रष्ट हो जाते हैं, [जो तत्वसाक्षात्कार तक विचार नहीं कर पाते हैं, जिन का विचार बीच में ही टूट जाता है] उनके प्रतिबन्ध का क्षय होने में बहुत जन्म लग जाते हैं। [एक दो या तीन जन्मों का कोई भी नियम नहीं है] परन्तु इस रुका- वट के कारण विचार व्यर्थ नहीं हो जाता है [क्योंकि प्रतिबन्ध के हटते ही फिर तुरन्त अपरोक्षज्ञानरूपी फल देखा जाता है।] प्राप्य पुण्यकृतां लोकान्नात्मतत्त्वविचारतः । शुचीनां श्रीमतां गेहे साभिलाषोऽभिजायते ॥४७॥ अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । निस्पृहो ब्रह्मतत्त्वस्य विचारात् तद्धि दुर्लभम् ॥४८॥ तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयस्तस्मादेतद्धि दुर्लभम् ॥४९॥ पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥५०॥ गीता में कहा है कि—योगभ्रष्ट लोग आत्मतत्त्व के विचार

Page 392Permalink

३७० पञ्चदशी

के प्रभाव से, पुण्यकारी लोगों को मिलने वाले स्वर्गादि लोकों को पाकर—वहाँ बहुत दिन तक सुख भोग कर—उस भोग के समाप्त हो जान पर,यदि उन्हें फिर भी कोई अभिलाषा रह गई हो, तो पवित्र श्रीमानों के कुल में जन्म लिया करते हैं ॥४७॥ यदि तो वह योगभ्रष्ट ब्रह्मतत्व का विचार करते रहने से निस्पृह [विरक्त] हो चुका हो तो वह उस विचार के प्रभाव से ऐसे लोगों के कुल में जन्म लेता है,जिनको आत्मतत्व का पूर्ण निश्चय हुआ रहता है। योगिकुल का यह जन्म बड़ा ही दुर्लभ है, थोड़े [मामूली] पुण्यों से यह किसी को नहीं मिल जाता ॥४८॥ क्योंकि इस योगियों के कुल में जन्म लेने पर वह योग- भ्रष्ट पहले देह के बुद्धिसंयोग को शीघ्र ही पा लता है। [वहाँ उसको योग के अनुकूल सामग्री तैयार मिलती है] फिर तो वह पहले प्रयत्न से भी अधिक प्रयत्न करने लग पड़ता है। इसी से कहते हैं कि ऐसा जन्म दुर्लभ होता है ॥ ४९ ॥ [फिर वैसा ही अभ्यास करने का कारण मो यह है कि] उस योगभ्रष्ट पुरुष को वह पूर्वाभ्यास जबरदस्ती अपनी ओर को खेंच ले जाता है। [समाधिनिद्रा उसको स्वयं ही ढूँढती फिरती है] यों अनेक जन्मों पर्यन्त किये गये प्रयत्नों से तत्व- ज्ञान को पाकर कहीं परागति किंवा मुक्ति को पा लेता है ॥५०॥ ब्रह्मलोकाभिवाञ्छायां सम्यक् सत्यां निरुध्य ताम् । विचारयेद् य आत्मानं न तु साक्षात् करोत्ययम् ॥५१॥ ब्रह्मलोक को पाने की दृढ इच्छा हो, परन्तु जो उस इच्छा को दबा कर आत्मविचार करता रहेगा, उसे आत्मसाक्षात्कार होगा ही नहीं।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१

Page 393Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७१


वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था इति शास्त्रतः । ब्रह्मलोके स कल्पान्ते ब्रह्मणा सह मुच्यते ॥५२॥ वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद् यतयः शुद्धसत्त्वाः ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे । ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसंचरे परस्यान्ते कृतात्मनः प्रविशन्ति परं पदम् । (मु० ३- २-६) इस शास्त्र के कथनानुसार वे ब्रह्मलोक में जाते हैं । वहाँ उन्हें तत्त्व का साक्षात्कार होता है । कल्पान्त के समय ब्रह्म के साथ वे भी मुक्त हो जाते हैं [ यों उनकी क्रममुक्ति होती है ] । केषांचित् स विचारोपि कर्मणा प्रतिबध्यते । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य इति श्रुतेः ॥५३॥ [तत्वविचार करते हुए भी किसी प्रतिबन्ध के कारण, इस जन्म में कइयों को साक्षात्कार नहीं हो पाता । दूसरे जन्मों में साक्षात् होता है] परन्तु कई ऐसे भी लोग होते हैं कि-उनके पाप कर्मों से विचार में भी रुकावट पड़ जाती है । उनको तो विचार का अवसर भी नहीं मिलता है । श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः (क० २-७) इस श्रुति में भी यही कहा गया है कि वह परमात्मतत्त्व बहुत से पापियों को तो सुनने को भी नसीब नहीं होता । अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद् वा सामग्र्या वाप्यसंभवात् । यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥५४॥ बुद्धि के अति मन्द होने के कारण, अथवा ज्ञान की सामग्री [गुरु या अध्यात्म शास्त्र या अनुकूल देश कालादि के] न मिलने से,जो विचार न कर सकता हो

प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ]

Page 394Permalink

३७२ पञ्चदशी हो] वह प्रति क्षण ब्रह्म की उपासना ही किया करे । [ इस प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ] निर्गुणब्रह्मतत्त्वस्य न ह्युपास्ते रसम्भवः । सगुणब्रह्मणीवात्र प्रत्ययावृत्तिसंभवात् ॥५५॥ गुणरहित होने के कारण निर्गुण ब्रह्मतत्त्व की उपासना हो नहीं सकती है, ऐसा विचार ठीक नहीं है । क्योंकि सगुण ब्रह्म में जैसे प्रत्यय की आवृत्ति हो सकती है, वैसी आवृत्ति, इस निर्गुण ब्रह्म में भी हो ही सकती है [यों निर्गुण तत्त्व की उपा- सना संभव हो जाती है । ] अवाङ्मनसगम्यं तन्नोपास्यमिति चेत् तदा । अवाङ्मनसगम्यस्य वेदनं न च संभवेत् ॥५६॥ वाणी और मन से अज्ञेय होने के कारण वह निर्गुण ब्रह्म यदि तुम्हारी समझ में उपास्य न हो सकता हो, तो फिर यों तो वाणी और मन से अगम्य उस तत्त्व का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा । वागाद्यगोचराकार मित्येवं यदि वेत्त्यसौ । वागाद्यगोचराकार मित्युपासीत नो कुतः ॥५७॥ यदि कहा जाय कि 'इस ब्रह्म का आकार वागादि के गोचर होने वाला नहीं है' इस रूप से उसे जान तो सकते हैं। तो हम कहेंगे कि फिर इसी [वागादि के अगोचर] रूप से ही उसकी उपासना क्यों नहीं हो सकती है ? [हम तो कहेंगे कि उस रूप से ही उसकी उपासना भी की जा सकती है ।] सगुणत्व मुपास्यत्वाद्यदि, वेद्यत्वतोऽपि तत् । वेद्यं चेल्लक्षणावृत्त्या लक्षितं समुपास्यताम् ॥५८॥

Page 395Permalink

यदि तुमको उपास्य होने से सगुणता का भय प्रतीत होता हो तो, वह भय तो वेद्य होने से भी होगा ही। यदि कहो कि वह वेद्य तो लक्षणा वृत्ति से होता है [इसीलिए सगुण नहीं होता] तो हम कहेंगे कि उपासना भी लक्षणा से ही कर डालो। ब्रह्म विद्धि तदेव त्वं न त्विदं यदुपासते । इति श्रुते रुपास्यत्वं निषिद्धं ब्रह्मणो यदि ॥५९॥ 'यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' ( केन १-५ ) यह श्रुति, जो उपास्य है उसके ब्रह्म होने का निषेध कर रही है। यह कहती है — जो मन वाणी का अगम्य तत्व है, उसी को तुम ब्रह्म समझो ! संसार के लोग जिसको 'यह' समझकर उपासना कर रहे हैं उसको ब्रह्म मत समझो। यह शंका यदि किसी को हो तो— विदितादन्यदेवेति श्रुते र्वेद्यत्वमस्य न । यथा श्रुत्यैव वेद्यं चेत्तथा श्रुत्याप्युपास्यताम् ॥६०॥ उसका उत्तर यह है कि—अन्यदेव तद्विदितादयो अविदिता- दधि (केन १-३) इस श्रुति ने तो इसके वेद्य होने का भी निषेध किया है। यदि श्रुति के कथनानुसार ब्रह्म को विदित और अविदित से अनोखा ही मान लेना चाहिये तो श्रुति के कथनानुसार वैसे ही की उपासना भी कर लेनी चाहिये । अवास्तवी वेद्यता चेदुपास्यत्वं तथा न किम् । वृत्तिव्याप्ति र्वेद्यता चेदुपास्यत्वेऽपि तत्समम् ॥६१॥ यदि कहो कि—वेद्यता तो ब्रह्म में वास्तव नहीं है। तो हम कहेंगे कि—उसमें उपास्यता भी वास्तव नहीं है। यदि कहा जाय कि—वेदन पक्ष में वृत्ति ब्रह्माकार हो सकती है तो

Page 396Permalink

३७४ पञ्चदशी हम कहेंगे उपास्य पक्ष में भी [ शब्द प्रमाण के बल से ] वृत्ति ब्रह्माकार हो ही सकती है । वृत्ति का ब्रह्माकार होना दोनों ही पक्षों में समान हो सकता है । का ते भक्ति रुपास्तौ चेत् कस्ते द्वेषस्तदीरय । मानाभावो न वाच्योऽस्यां बहुश्रुतिषु दर्शनात् ॥६२॥ यदि मुझ पर यह युक्ति-शून्य उलहना दो, कि उपास्ति में तुम्हें इतनी भक्ति क्यों है ? तो हम पूछेंगे कि तुम्हें उपासना से ही इतना द्वेष क्यों होगया है ? निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने के प्रमाण नहीं मिलते यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि अनेक श्रुतियों में निर्गुण ब्रह्म की उपासना देखी ही गयी है । उत्तरस्मिंस्तापनीये शैब्यप्रश्नेऽथ काठके । माण्डूक्यादौ च सर्वत्र निर्गुणोपास्तिरीरिता ॥६३॥ निर्गुणोपासना को बताने वाली बहुत सी श्रुतियाँ भी देख लो—शैब्य के प्रश्न करनेपर तापनीय उपनिषत् में निर्गुणो- पासना का कथन किया गया है । प्रश्न उपनिषत् के पाँचवें प्रश्न में ‘यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्यनेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत’ ( प्रश्न ५-५ ) में निर्गुणोपासना का वर्णन आया है । कठोपनिषत् में ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ( कठ २-१५ ) से प्रारम्भ करके ‘एत- द्ध्येवाक्षरं ब्रह्म’ ( कठ-२-१६ ) ‘एतदालम्बनं श्रेष्ठम्’ ( कठ-२-१७) इत्यादि से प्रणवोपासना कही गई है । माण्डूक्य उपनिषत् में ‘ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्’ इत्यादि से तीनों अवस्थाओं से परे रहनेवाले चतुर्थ तत्व की उपासना बतायी गयी है । तैत्तिरीय मुण्डक आदि में भी निर्गुणोपास्ति का वर्णन आया ही है ।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५

Page 397Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७५ अनुष्ठानप्रकारोऽस्याः पञ्चीकरण ईरितः । ज्ञानसाधनमेतच्चेनेति केनात्र वारितम् ॥६४॥ इस निर्गुणोपासना को कैसे करें ? यह बात श्रीमच्छंकरा- चार्य के 'पंचीकरण' नाम के ग्रन्थ में कही है। यदि कहो कि यह उपासना मुक्ति का साधन नहीं है, यह तो ज्ञान का ही साधन है । तो हम कहेंगे कि हम इस बात का निषेध नहीं करते । यह तो हमें स्वीकार ही है। नानुतिष्ठति कोप्येतदिति चेन्मानुतिष्ठतु । पुरुषस्यापराधेन किमुपास्तिः प्रदुष्यति ॥६५॥ यदि कहो कि सगुणोपासना करने वाले तो बहुत से पाये जाते हैं, निर्गुणोपासना तो कोई भी करता नहीं दीखता । तो हम कहेंगे कि—भले ही कोई निर्गुणोपासना न करो, यह तो करनेवाले पुरुषों की कमी है। पुरुष की कमी से उपासना का क्या बिगड़ता है ? इतोऽप्यतिशयं मत्वा मन्त्रान् वश्यादिकारिणः । मूढा जपन्तु तेभ्योऽतिमूढाः कृषिमुपासताम् ॥६६॥ सगुणोपासना से भी सुकर देखकर मूढ लोग वशीकरण आदि मन्त्रों का जप करें, उनसे भी मूर्ख लोग खेती करलें तो भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को कैसे छोड़ देंगे ? सगुणोपासना का फल भी बहुत दिनों बाद मिलता है। इस कारण ऐहिकफल देने की अधिकता को देखकर, मूढ लोग वशीकरणादि मन्त्रों का जप करें। परन्तु उन्हें देखकर विवेकी लोग सगुणोपासना को छोड़ नहीं देते हैं। अथवा उनसे भी अतिमूर्ख लोग, किसी भी नियम में न बँधने की स्वतन्त्रता

Page 398Permalink

३७६ पञ्चदशी देखकर खेती की उपासना करने लगे। परन्तु उन्हें देखकर मन्त्रों का जप करनेवाले लोग अपने मन्त्रानुष्ठान को छोड़ नहीं बैठते हैं। इसी प्रकार जिन्हें सांसारिक फलों की चाह लगी हुई है, वे अगर निर्गुणोपासना का अनुष्ठान नहीं करते हैं, तो भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को नहीं छोड़ सकते हैं। तिष्ठन्तु मूढाः प्रकृता निर्गुणोपास्तिरीर्यते । विद्यैक्यात् सर्वशाखास्थान् गुणानत्रोपसंहरेत् ॥६७॥ मूढ लोगों की बातों को यहीं छोड़कर, अब प्रकृत निर्गुणो- पासना का कथन किया जाता है। ['सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्य- विशेषात्' (वेदान्त ३-३-१) जो जो उपासनायें जहां तहां वेदान्तों में बिखरी पड़ी हैं, क्योंकि चोदना सब जगह एक सी ही है, इस कारण उन उपासनाओं में कोई भी भेद नहीं है]। इस व्याससूत्र के अनुसार निर्गुणोपासना नाम की विद्या तो एक ही है। इस कारण भिन्न-भिन्न शाखाओं में वर्णित उन उन सब उपास्य गुणों को, इसी उपासना में इकट्ठे करके उपा- सना करनी चाहिये । आनन्दादेर्विधेयस्य गुणसङ्घस्य संहृतिः । आनन्दादय इत्यस्मिन् सूत्रे व्यासेन वर्णिता ॥६८॥ वे गुण दो प्रकार के हैं—एक 'विधेय' दूसरे 'निषेध्य' । उनमें आनन्द, [विज्ञान, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, मुक्त, निर- ञ्जन, विभु, अद्वितीय, आनन्द, पर, प्रत्यगेकरस ] इत्यादि जो जो भी विधेय गुण हैं, उन सबका उपसंहार इस उपासना में

[header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३७७ [/header]

Page 399Permalink

[header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३७७ [/header]

कर लेना चाहिए । यह बात 'आनन्दादयः प्रधानस्य' ( वेदान्त ३-३-११) [ प्रधान जो ब्रह्मतत्व है उसके जो आनन्द आदि धर्म हैं उनका उपसंहार सभी जगह कर लेना चाहिए ] इस सूत्र में व्यासदेव ने कही है। अस्थूलादेर्निषेध्यस्य गुणसंघस्य संहृतिः । तथा व्यासेन सूत्रेऽस्मिन्नुक्ताऽक्षरधियां त्विति ॥६९॥ अस्थूल [ अनणु, अह्रस्व, अद्देश्य, अग्राह्य, अशब्द, अस्पर्श, अरूप, तथा अव्यय ] आदि जो भी निषेध्य गुण हैं, जो जहां तहां अध्यात्मशास्त्र में कहे गये हैं, उन सब का भी उपसंहार इस उपासना में कर लेना चाहिये। यह बात 'अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्या मौपसदनवत्तदुक्तम् (वेदान्त ३-३-३३) इस सूत्र में व्यासदेव ने कही है। अक्षर ब्रह्म में द्वैत का निषेध करने वाली जो बुद्धियां हैं उनको सब ही निषेधों में उपसंहार कर डालना चाहिये । निर्गुणब्रह्मतत्वस्य विद्यायां गुणसंहृतिः । न युज्येतेत्युपालम्भो व्यासं प्रत्येव मां न तु ॥७०॥ 'निर्गुण ब्रह्म की विद्या में गुणों का उपसंहार तो ठीक ही नहीं है। क्योंकि गुणों का उपसंहार निर्गुण विद्यापन का विरोधी है' यह आक्षेप व्यासदेव पर ही करना चाहिये,मुझ पर नहीं। मैंने तो केवल उनके कहे गुणोपसंहार का कथन कर दिया है। हिरण्यश्मश्रुसूर्यादिमूर्तीनामनुदाहृतेः । अविरुद्धं निर्गुणत्वमिति चेत् तुष्यतां त्वया ॥७१॥ हिरण्यश्मश्रु युक्त सूर्य आदि सगुण मूर्तियों का कथन न होने से, इस अस्थूलता आदि के होने पर भी निर्गुणता में कोई

Page 400Permalink

३७८ पंचदशी विरोध नहीं है [ निर्गुणता में विरोध तो किसी सगुण मूर्ति से होता । इससे यह निर्गुणोपासना ही है] ऐसा यदि तू समझं गया है तो तू सन्तोष कर [ तुझे तत्व का ज्ञान हो चुका है ] गुणानां लक्षकत्वेन न तत्वेऽन्तः प्रवेशनम् । इति चेदस्त्वेवमेव ब्रह्मतत्वमुपास्यताम् ॥७२॥ आनन्दादि या अस्थूलादि जो गुण हैं वे तो वस्तु के लक्षक होते हैं [ वे वस्तु की तरफ को संकेत ( इशारा ) भर कर सकते हैं—वे उसके स्वरूप नहीं होते हैं ] वे उपास्य तत्व के अन्दर तक प्रवेश नहीं करते हैं, ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे कि हां ठीक है । ऐसे लक्षित ब्रह्म की ही उपासना किया करो कि गुण उस के अन्दर तक नहीं प्रविष्ट होते हैं [ यों तुम लक्षित ब्रह्म की ही उपासना किया करो ] आनन्दादिभि रस्थूलादिभिश्चात्मात्र लक्षितः । अखण्डैकरसः सोहमस्मीत्येव मुपासते ॥७३॥ उपासना की रीति यह है—इन श्रुतियों में जो अखण्डैकरस आत्मा आनन्द आदि तथा अस्थूल आदि गुणों से लक्षित किया गया है, मुमुक्षु लोग उस की उपासना 'सोऽहमस्मि' वही मैं हूँ इस रूप में किया करते हैं । बोधोपास्त्यो र्विशेषः क इति चेदुच्यते शृणु । वस्तुतन्त्रो भवेद् बोधः कर्तृतन्त्रमुपासनम् ॥७४॥ बोध और 'उपासना' में जो भेद है वह भी हमसे सुन लो— ज्ञान तो ज्ञेय वस्तु के अधीन हुआ करता है । उसके विपरीत उपासना कर्ता के अधीन होती है ।

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९

Page 401Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९ विचाराज्जायते बोधोऽनिच्छा यं न निवर्तयेत् । स्वोत्पत्तिमात्रात् संसारे दहत्यखिलसत्यताम् ॥७५॥ बोध तो विचार से उत्पन्न हुआ करता है, मुझे बोध न हो यह चाहने पर भी उस बोध को कोई रोक नहीं सकता । वह बोध ज्यों ही उत्पन्न हो जाता है त्यों ही इस संसार की सत्यता को जला देता है [ नष्ट कर देता है ] तावता कृतकृत्यः सन्नित्यतृप्तिमुपागतः । जीवन्मुक्ति मनुप्राप्य प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥७६॥ तत्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने से ही नित्यतृप्ति अर्थात् सर्वा- धिक सुख को पाकर, जीवन्मुक्ति का महालाभ करके, अपने प्रारब्ध क्षय की बाट जोहने लगता है । आप्तोपदेशं विश्वस्य श्रद्धालु रविचारयन् । चिन्तयेत् प्रत्ययैरन्यै रनन्तरितवृत्तिभिः ॥७७॥ गुरु के उपदेश पर [ जिनमें उसने उपास्य के स्वरूप का प्रतिपादन किया हो ] विश्वास करके, स्वयं उस पर कुछ भी विचार न करके, अपने उपास्यतत्व का निरन्तर चिन्तन करे । ध्यान न रहे कि—इस चिन्तन के बीच में अन्य किसी भी विषय का विचार न आने पाये । यावच्चिन्त्यस्वरूपत्वाभिमानः स्वस्य जायते । तावद् विचिन्त्य, पश्चाच्च तथैवामृति धारयेत् ॥७८॥ ऐसा चिन्तन कब तक करते जायें सो भी सुनो—चिन्तन करते करते ऐसी अवस्था आ जायगी, कि तुम्हें स्वयं ही यह भाव होने लगेगा कि यह चिन्त्य स्वरूप तो स्वयं मैं ही हूँ। बस

Page 402Permalink

३८० पञ्चदशी यहीं चिन्तन को समाप्त कर दो और मरणपर्यन्त इस धारणा को बनाये रक्खो । ब्रह्मचारी भिक्षमाणो युतः संवर्गविद्यया । संवर्गरूपतां चित्ते धारयित्वा ह्यभिक्षत ॥७९॥ उपासक भी उपास्य रूप का अभिमान कर लेता है यह बात शास्त्र में देखी गयी है—संवर्ग गुणवाले प्राण की उपासना करने वाला कोई ब्रह्मचारी, जब भिक्षा करने चला तो उसने अभिप्रतारि राजा के सामने अपने आप को संवर्ग रूप मानकर ही भिक्षा की थी । यह बात छान्दोग्य में है । पुरुषस्येच्छया कर्तु मकर्तुं कर्तुमन्यथा । शक्योपास्तिरतो नित्यं कुर्यात् प्रत्ययसन्ततिम् ॥८०॥ उपासना तो पुरुष की इच्छा पर निर्भर रहती है । वह चाहे करे, चाहे न करे, चाहे तो उलट पुलट कर डाले । इस लिये उपासना तो सदा ही करनी चाहिये । [ उसे मरण-पर्यन्त छोड़ना नहीं चाहिये ] वेदाध्यायी ह्यप्रमत्तोऽधीते स्वप्नेऽधिवासतः। जपिता तु जपत्येव तथा ध्यातापि वासयेत् ॥८१॥ जो सावधान वेदपाठी है, या जो सदा जप करता रहता है, वह दृढ वासना के कारण सुपने में भी वेदपाठ या जप किया ही करता है । इसी प्रकार उपासक लोग भी उपासना की वासना को इतना दृढ करें कि सुपने आदि में भी उसी का ध्यान आने लग पड़े । विरोधिप्रत्ययं त्यक्त्वा नैरन्तर्येण भावयन् । लभते वासनावेशात् स्वप्नादावपि भावनाम् ॥८२॥

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१

Page 403Permalink

[Header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१

विरोधी विचारों का त्याग करके जब निरन्तर भावना की जाती है तब संस्कारों की प्रबलता हो जाने से सपने आदि में भी ध्यान होने लग जाता है । भुञ्जानोऽपि निजारब्धमास्थातिशयतोऽनिशम् । ध्यातुं शक्तो न संदेहो विषयव्यसनी यथा ॥८३॥ यदि किसी को अपने उपास्य में अधिक श्रद्धा हो तो अपने प्रारब्ध को भोगते हुए भी विषयव्यसनी की तरह, निरन्तर उपा- सना कर ही सकता है, इसमें सन्देह मत करो । परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि । तदेवास्वादयत्यन्तः परसंगरसायनम् ॥८४॥ लोक में भी देख लो कि—जिस नारी को परपुरुष का व्यसन पड़ जाता है, वह घर के [लेपन संमार्जन आदि] कामों में लगी रहने पर भी, अपने मन से उसी परसंगरसायन का मज़ा चखा करती है । परसङ्गं स्वादयन्या अपि नो गृहकर्म तत् । कुण्ठीभवेदपि त्वेतदापातेनैव वर्तते ॥८५॥ परसंग का स्वाद लेने वाली उस नारी के घर के काम भी बन्द नहीं हो जाते । वे भी बराबर चलते ही रहते हैं । उसके ये काम तो ऊपर के मन से होते जाते हैं । गृहकृत्यव्यसनिनी यथा सम्यक् करोति तत् । परव्यसनिनी तद्वन्न करोत्येव सर्वथा ॥८६॥ अपने घर के कामों का ही जिस नारी को व्यसन है, वह जैसे घर के काम भले प्रकार [जी लगाकर] करती है, परव्यस- निनी नारी उसकी तरह घर के काम प्रेम से करती ही नहीं ।

Page 404Permalink

एवं ध्यानैकनिष्ठोऽपि लेशाल्लौकिकमारभेत् । तत्ववित्त्वविरोधित्वाल्लौकिकं सम्यगाचरेत् ॥८७॥ उस नारी के समान ध्यानैकनिष्ठ पुरुष भी अपने लौकिक कामों को अधूरे तौर पर करते रहते हैं । व्यवहार तत्वज्ञान का विरोधी नहीं होता, इस कारण तत्वज्ञानी लोग तो लौकिक कार्यों को भी भले प्रकार निभा ले जाते हैं [ ज्ञानी होते ही लौकिक व्यवहार छुट जाता है, या छोड़ देना चाहिये, ऐसा विचार भ्रमपूर्ण है । ज्ञानी लोगों के व्यवहार तो और लोगों से उत्तम प्रकार के होने चाहियें । उनका व्यवहार दूसरों के लिये आदर्श का काम दे, ऐसा होना चाहिये ] । मायामयः प्रपंचोऽय मात्मा चैतन्यरूपधृक् । इति बोधे विरोधः को लौकिकव्यवहारिणः ॥८८॥ जो तत्व ज्ञानी ऐसा समझकर लौकिक व्यवहार करता है कि—यह प्रपंच तो मायामय है, आत्मतत्व तो केवल चैतन्य रूप है, फिर बताओ कि उसे व्यवहार का विरोध कैसे होगा ? अपेक्षते व्यवहृति र्न प्रपंचस्य वस्तुताम् । नाप्यात्मजाड्यं, किंन्त्वेषा साधनान्येव कांक्षति ॥८९॥ व्यवहार को न तो यही ज़रूरत है कि—'प्रपंच सच्चा ही हो' न वह यही चाहता है कि 'आत्मा जड ही हो।' उसे तो केवल साधनों की ही ज़रूरत होती है । मनोवाक्कायतद्वाह्यपदार्थाः साधनानि, तान् । तत्वविन्नोपमृद्नाति, व्यवहारोऽस्य नो कुतः ॥९०॥ जब कि तत्व ज्ञानी पुरुष मन, वाणी, काय तथा बाहर के गृह-क्षेत्र आदि पदार्थों का—जो कि व्यवहार के साध-

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३

Page 405Permalink

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८३ हैं—उपमर्द [ निवारण ] ही नहीं करता है तब फिर इस ज्ञानी का व्यवहार क्यों कर नहीं चलेगा ? उपमृद्नाति चित्तं चेद् ध्यातासौ न तु तत्ववित् । न बुद्धिं मर्दयन् दृष्टो घटतत्वस्य वेदिता ॥९१॥ अगर कोई अपने चित्त का उपमर्द करता है तो वह ध्याता [ उपासक ] है । वह तत्वज्ञानी नहीं है । लोक में भी देखते हैं कि—घटतत्व का जाननेवाला पुरुष, बुद्धि का मर्दन [ किंवा उसे एकाग्र ] करता हुआ कहीं भी नहीं देखा जाता । सकृत्प्रत्ययमात्रेण घटश्चेद् भासते सदा । स्वप्रकाशोऽयमात्मा किं घटवच्च न भासते ॥९२॥ यदि केवल एक बार के ही ज्ञान से घट का भास सदा के लिये होजाता है [ और चित्त के निरोध की कोई जरूरत नहीं रहती है ] तो भला स्वयं प्रकाश यह आत्मा—जो घट से बहुत ही स्पष्ट है—घट की तरह ही क्यों नहीं भास सकता है ? [ इस आत्मा के ज्ञान में चित्तनिरोध की कौन-सी आव- श्यकता है ? ] स्वप्रकाशतया किं ते तद् बुद्धिस्तत्ववेदनम् । बुद्धिश्च क्षणनाश्येति चोद्यं तुल्यं घटादिषु ॥९३॥ ब्रह्म यद्यपि स्वयं प्रकाश तो है, परन्तु ब्रह्म को विषय करनेवाली बुद्धि ही तो तत्वज्ञान कहाती है, वह बुद्धि तो क्षणिक है [ इस कारण वह चाहती है कि—उसकी स्थिति ब्रह्म में बार बार की जांय, उसे बार बार उसमें लगाया जाय ] तो भाई ! यह आशंका तो घटादियों में भी समान ही है ।

Page 406Permalink

३८४ पञ्चदशी तो घटादि भी यह चाहेंगे कि हम में भी बुद्धि को बार बार लगाया जाय ] । घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव, यदा घटः । इष्टो नेतुं तदा शक्य इति चेत् सममात्मनि ॥९४॥ घटादि का निश्चय जब होजाता है तब घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है [ अथवा यों समझो कि घटादिज्ञान क्षणिक तो हैं ] परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत हो तभी उस घट को ले जा सकते हैं [उसमें चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत नहीं होती ] तो हम कहेंगे कि—यही बात आत्मा के विषय में भी समझ लो । [ उसमें भी चित्त को स्थिर कर रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती है ] । निश्चित्य सकृदात्मानं यदापेक्षा तदैव तम् । वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्नोत्येव हि तत्ववित् ॥९५॥ [ इस बात को आत्मा के विषय में यों समझो कि ] जब एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय होजाता है, तब फिर जब कभी अपेक्षा होती है तभी उसके विषय का कथन, मनन या ध्यान ज्ञानी लोग कर ही सकते हैं । उपासक इव ध्यायन् लौकिकं विस्मरेद् यदि । विस्मरत्वेव सा ध्यानाद् विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥९६॥ तत्त्वज्ञानी लोग भी, ध्यान करते करते, यदि उपासकों के समान ही, लौकिक बातों को भूलते हैं, तो भूल जायें । उनका यह विस्मरण ध्यान की प्रबलता से है, यह विस्मरण ज्ञान के कारण नहीं है ।