भारतकोश
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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

4. Dvaita Viveka

[ ४ ] द्वैतविवेक का संक्षेप द्वैतविवेक नाम के चौथे प्रकरण में बताया गया है कि—द्वैत दो तरह का होता है । एक ईश्वर का द्वैत, दूसरा जीव का द्वैत । इन्द्रियों से दीख पड़ने वाला संसार ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत है । इस द्वैत के विषय में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार जीवों के जो भिन्न भिन्न प्रकार के मनोविचार बनते हैं वही तो जीव का बनाया हुआ द्वैत कहाता है । ईश्वर जिन पदार्थों को बनाता है वह तो उनका स्वरूप ही बनाता है । ईश्वर के बना देने से ही वे हमारे ( जीवों के ) काम के नहीं हो जाते हैं । वे तो हमारे काम के तभी होते हैं जब हमें उनके विषय में कुछ ज्ञान हो जाय, जब हम उनका ध्यान करने लग पड़ें, जब हम उन्हें सुखदायी या दुःखदायी मान बैठें तथा उनको पाने या छोड़ने का कर्म ( उद्योग ) करने लगें । यही कारण है कि ईश्वर की सृष्टि के अनन्त पदार्थों में से केवल वे ही थोड़े से पदार्थ हमारे भोग में आते हैं जिनका हम ध्यान किया करते हैं जो हमारे मन में बस जाते हैं, या जिनके पाने या छोड़ने का उद्योग हम किया करते हैं । यों इस जगत् को ईश्वर बनाता है और अपने ज्ञान तथा कर्म के द्वारा जीव इसको भोगता है । जब ईश्वर मायावृत्ति नाम का संकल्प करता है तब इस जगत् की उत्पत्ति हो जाती है । अत्यन्त बहिर्मुख होने के कारण हम लोगों का संकल्पबल तो नष्ट प्राय हो गया है । कछवी अपने बच्चों को केवल संकल्प के बल से पालती है । जो काम दूसरे प्राणी अपने बच्चों को दूध

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३

[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३ पिलाकर निकालते हैं वही काम कछवी अपने संकल्प से कर डालती है। संयम करते करते संयमी लोगों के संकल्प में फिर कर्म की शक्ति आ जाती है। संकल्प में से ही तो कर्म में बल आता है। तत्त्वज्ञानी के कर्म में और संकल्प में दोनों जगह बल रहता है। ईश्वर को कर्म करना ही नहीं पड़ता। उसको केवल संकल्प करना पड़ता है। बस कर्म अपने आप हो जाता है। यों वे संकल्प से सृष्टि बना लेते हैं। जब जीवात्मा इस ईश्वरोत्पादित जगत् के विषय में अपने मनोवृत्ति नाम के संकल्प दौड़ाता है, तब यह जगत् उसके भोग का साधन बनता है, नहीं तो नहीं बनता। ईश्वर तो मणि को एक ही तरह का बनाते हैं, परन्तु जिसको वह मिलती है, वह हर्ष करता है। जिसे नहीं मिलती, वह पछताता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें न पाने का हर्ष होता है और न उन्हें न मिलने का पछतावा ही होता है। यों एक मणि में तीन आकार सिद्ध होते हैं —एक 'प्रिय' दूसरा 'अप्रिय' तीसरा 'उपेक्ष्य'। ये तीनों ही आकार जीवों की भिन्न- भिन्न बुद्धियों के अनुसार ही होते हैं। इन आकारों के बनाने में ईश्वर का हाथ सर्वथा नहीं होता। देखते हैं कि सम्बन्धियों के भेद से एक ही स्त्रीपिण्ड दादी, माता, पत्नी, पुत्री, पौत्री आदि अनेक रूपों में देखी जाती है। वह जो ईश्वरनिर्मित मांसमय स्त्रीपिण्ड है, वह तो अवश्य ही एक तरह का रहता है, परन्तु मनोमयी स्त्रियां एक में ही अनेक हो जाती हैं। क्योंकि भोक्ताओं के मन भिन्न-भिन्न होते हैं। श्रम के समय में, मनोराज्य के समय में और स्मृति के समय म तो मनोमय पदार्थों से ही हमारा व्यवहार होता है। इन अवस्थाओं में ईश्वर का बनाया पदार्थ होता ही नहीं। जाग्रत् काल में भी मनोमय पदार्थों से ही

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व्यवहार होते हैं। परन्तु जाग्रत् समय के मनोमय पदार्थों को अत्यन्त सावधानी से जान लेना चाहिये। जब हमारा मन किसी पदार्थ को देखता है, तब वह उसी पदार्थ के रूप का हो जाता है। आंख बन्द करके ध्यान करते ही वही रूप हमारे मन में दीखा करता है। यों जब हम जागरण के समय किसी पदार्थ को देखते हैं तब वहां दोहरे पदार्थ होते हैं—जैसे एक मिट्टी का घड़ा दूसरा मन का घड़ा। मिट्टी के घड़े को तो हम प्रमाणों से जानते हैं। परन्तु हमारा मनोमय घड़ा प्रमाणों से नहीं दीखता। वह तो साक्षी आत्मा से प्रकाशित हुआ करता है। हमको जो वस्तु बन्धन में डालती है वह यह 'मनोमय' ही तो है। यह हो तो सुख दुःख होते हैं, नहीं तो नहीं होते। बाह्य पदार्थ नहीं भी होते, तब भी सुपने आदि में मनोमय पदार्थों से जीव को सुख दुःख हो जाते हैं। सुपने की मनोमयी स्त्री के संग से वीर्यपात हो जाता है। समाधि, सुषुप्ति या मूर्छाकाल में बाह्यपदार्थ बने भी रहते हैं, परन्तु तब मनोमय पदार्थ न होने से जीवों को सुख दुःख नहीं होते। पुत्र दूरदेश में गया हो और वह जीता हो तब उस का पिता वंचक के कहने से उसे मरा समझ कर रो देता है। क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ मर गया है। पुत्र मर भी गया हो परन्तु उसका समाचार न मिला हो तब नहीं रोता। क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ तो जीवित ही है। यों यह स्पष्ट है कि मानस जगत् ही बन्धन करने वाला है। इस मानस द्वैत को नष्ट करने के दो उपाय हैं एक 'योग' दूसरा 'ज्ञान'। योग में मनोनिरोध करना पड़ता है, उससे मानस संसार बनना रुक तो जाता है, परन्तु वह बीजरूप में तो रहता ही है। जब भी मनो- निरोध करना छोड़ेंगे, तुरन्त मानस द्वैत आ खड़ा होगा और वह

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

द्वैतविवेक का संक्षेप २५

बन्धन करेगा ही। मानसद्वैत को सदा के लिये नष्ट कर देनेवाला
उपाय, ब्रह्मतत्व का—अपने व्यापक आत्मतत्व का—ज्ञान ही है।
ईश्वर का द्वैत आंखों के सामने खड़ा भी रहे परन्तु उसको मिथ्या
( बाधित होजाने वाला ) समझ लेने से ही, पारमार्थिक अद्वैत का
ज्ञान हो सकता है। जब पारमार्थिक अद्वैत का ज्ञान हो जाता
है तब मानससंसार का बनना सदा के लिये रुक जाता है।
जब प्रलय हो जाती है—जब अद्वैत ज्ञान करानेवाले गुरु
या शास्त्र नहीं रह जाते और जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करने
वाला द्वैत नहीं रहता है—तब तो अद्वितीय तत्व समझ में आ
ही नहीं सकता। अद्वैत तत्व तो तभी समझ में आता है जबकि
इसका विरोधी द्वैत सामने दिखाई देता हो। यदि द्वैत दिखाई
न देता हो तो अद्वैत जैसे गहन तत्व को जानने का कोई साधन
ही हमारे पास नहीं रह जाता। यों ईश्वर का निर्मित द्वैत अद्वैत-
ज्ञान का बाधक ही नहीं है प्रत्युत साधक भी है। सत्य संकल्प
उस ईश्वर के बनाये हुए उसको हटा देना हम अल्पशक्ति जीवों के
वस का काम भी तो नहीं है। कोई कोई साधक यह मनाया
करते हैं कि स्त्री बच्चे मर जांय तो मैं छूट जाऊँ। उनको यह सम-
झना चाहिये कि ईश्वर के संकल्प से उत्पन्न हुए स्त्री बच्चे तभी
मरेंगे जब ईश्वर का संकल्प पूरा हो जायगा। इन निष्फल संकल्पों
से क्या होना है ? करने की बात तो केवल इतनी ही है कि
तुम उनको अपना मानना छोड़ दो। हमारा इनसे जो मानस
सम्बंध है उसी से तो.हम बँध रहे हैं। उसे न हटाकर, ईश्वर
की चीज़ को बिगाड़ने की इच्छा तो उपहासास्पद इच्छा ही है।
हमको तो इस ईश्वर के द्वैत के रहते रहते ही अपना अद्वैत मार्ग
साफ़ कर लेना.है। इससे द्वेष करना ठीक नहीं है। जैसे मानस

२६ पंचदशी द्वैत से राग करना बन्धनकारक है वैसे ही ईश्वर के द्वैत से द्वेष करना भी बन्धनकारक ही है। जीव के द्वैत के दो भेद हैं—एक शास्त्रीय दूसरा अशास्त्रीय। आत्मा और ब्रह्म का विचार शास्त्रीय मानस जगत् है। इस द्वैत को तत्वज्ञान हो चुकने के बाद छोड़ देना चाहिए। अशास्त्रीय द्वैत के दो भेद हैं—एक काम क्रोध आदि, दूसरा मनोराज्य। ये रहेंगे तो तत्वज्ञान होगा नहीं। किसी तरह तात्कालिक उपाय कर देने से यदि ज्ञान हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं। तत्वज्ञान के बाद जीवन्मुक्ति की अवस्था आनी ही चाहिये। उसमें गीता वाली दैवी संपत्ति आनी ही चाहिए। जो पुरुष काम क्रोधादि के झंझटों में उलझा पड़ा है, उसका ज्ञान 'ज्ञान' नहीं है। वह मुक्ति रूप फल को देनेवाला नहीं है। वह तो कोरा ( बन्ध्य ) ज्ञान है। ज्ञान हो जाय और काम क्रोध आदि न छोड़े जांय, व्यवहार में शुद्धि न आजाय, ज्ञानी का व्यवहार यह न कहने लग पड़े कि इसके व्यवहार में देहात्मवाद काम नहीं कर रहा है, तो वह ज्ञान ऐसा ही निर- र्थक है जैसे कि औषध सेवन करके पथ्यसेवन न किया जाय। जिसके मन से विषयसुख की लालसा नहीं मिटी है उसको हज़ार ज्ञान होजाय तौ भी उसकी जन्मपरम्परा टूटनेवाली नहीं है। जो ज्ञानी होकर भी कामादि को नहीं छोड़ता है उसका बहुत बड़ा पतन होता है। कारण यह है कि अज्ञानी लोग जिस ईश्वर तत्व से डरकर या कर्मगति से भय मानकर पाप-कर्म से बचते हैं वह भय तो इसके मन से जाता रहता है। ऐसा ज्ञानी अवश्य ही पतित हो जाता है। ज्ञान होने से पहले मनो- दोष अज्ञानी को सताते हैं, अब ऐसे कोरे ज्ञानी की लोक में निन्दा भी होने लगती है। यों इस शुष्क ज्ञान से तो वह अज्ञान

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ही अच्छा था। तत्त्वज्ञान का इतना तो दृष्टफल होना ही चाहिये कि तत्त्वज्ञानी का व्यवहार उसका रहन सहन, उसकी बात-चीत, सब में अलौकिकपना हो और उसके व्यवहार से उसकी पूजा हो, लोग उसको श्रद्धा से देखें। कामादि के साथ ही साथ, सब दोषों के मूल मनोराज्य को भी, बन्द कर देना चाहिये। मनोराज्य को जीतने के लिये निर्विकल्प समाधि करनी चाहिये। सविकल्प समाधि करने से निर्विकल्प समाधि होने लगती है। जिसको तत्व का ज्ञान हो जाय, जो एकान्त वास करता हो अर्थात् हृदय में बहुतायत से रहने लग पड़ा हो, जिसके बुद्धि दोष नष्ट हो गये हों वह, लम्बे प्रणवों को बोलकर मनोराज्य को जीत सकता है। जब मनोराज्य पर विजय मिल जाती है तब साधक के वृत्ति- शून्य मनकी हालत गूँगे पुरुष की-सी हो जाती है। गूँगा जैसे कुछ भी नहीं बोलता इसी प्रकार उसके गूँगे मन में वृत्तियों का उत्पन्न होना रुक जाता है। 'दृश्य नहीं है' इस ज्ञानरूपी झाडू को पकड़ कर, मनरूपी मन्दिर में से, दृश्यरूपी कूड़े को निकाल कर, फेंक दिया जाय तो निरतिशय मोक्ष सुख अन्दर से उमड़ ही पड़ता है। कामादि अवस्थाओं के नष्ट हो जाने पर, जब वासनाओं से शून्य गम्भीर मौनावस्था का प्रादुर्भाव हो जाता है, तब इस दशा से उत्तम दशा और कोई भी नहीं है। ऐसा परमपद जिन लोगों ने पा लिया हो, उनको भी कभी-कभी भोग- दायी कर्मों के प्रभाव से विक्षेप हो ही जाता है। परन्तु उनके अभ्यास की प्रबलता उस विक्षेप को ठहरने ही नहीं देती। उनकी बुद्धि फिर तुरन्त ही समाहित हो जाती है। हाँ जिन महापुरुषों को विक्षेप होना सर्वथा बन्द हो गया हो, उनको तो

२८ पंचदशी ब्रह्मज्ञानी कहना भी ठीक नहीं है । अध्यात्मविद्या के पारंगत मुनि लोगों का कहना है कि वे तो साक्षात् ब्रह्मतत्व ही—सर्वव्यापक आत्मतत्व ही—हो चुके हैं । जीव के बनाये हुए द्वैत को जब कोई प्राणी सम्पूर्ण रूप से छोड़ चुकेगा, तभी उसे जीवन्मुक्ति की ऊँची से ऊँची हालत प्राप्त हो सकेगी, इसी विचार को लेकर हमने ईश्वर के बनाये हुए द्वैत से, जीव के बनाये हुए द्वैत को, मुमुक्षु लोगों के सुभीते के लिये, छांट कर रख दिया है ।

5. Mahavakya Viveka

महावाक्यविवेक का संक्षेप

'महाश्रोत्रिय' 'महाराजा' 'महायात्रा' 'महाप्रस्थान' 'महा- ज्ञानी' आदि जैसे शब्द हैं वैसा ही यह 'महावाक्य' भी है। इसका एक यह भी अर्थ हो सकता है कि—जिस से बड़ा, जिससे व्यापक अर्थ वाला कोई अन्य वाक्य न हो सकता हो। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि—जिसके पश्चात् दूसरा वाक्य बोलना ही पड़ता हो। या यों कहो कि बोलने की आवश्यकता ही न रह जाती हो। जो प्राणी दिन रात बहिर्मुख बने रहते हैं, जो प्राणी आठों पहर इन्द्रियद्वारों पर ही डटे रहते हैं, उनमें से कोई जब किसी नाटक के नटों, या पालतू तोते मैनाओं के समान इन महावाक्यों को बोल उठे तो उसकी बात हम नहीं कहते हैं। हम तो केवल उन महामना मुनियों की ओर को संकेत करना चाहते हैं, जिनके हृदयधाम में धधकती हुई ज्ञानाग्नि की ज्वाला में सृष्टि के पदार्थों की स्वाधीन सत्ता सरकण्डे की रूई के समान भड़भड़ा कर भस्म हो चुकी हो। वे जब अपने एकान्त हृदय- मन्दिर के मौनप्रदेश में बैठकर इन वाक्यों को बोल बैठते हैं और जब उनके हृदय-प्रदेश में सदा के लिये सन्नाटा छा जाता है—जिसके बाद एक भी अन्यर्थ वाक्य ऐसा सुनाई नहीं पड़ा सकता जो उनके उस गंभीर सन्नाटे को कभी भी भंग कर सकता हो, तब इन वाक्यों को 'महावाक्य' कहना बड़े ही गौरव की बात प्रतीत होती है। यह प्रकरण आगमप्रधान है—इसमें कुतर्क और व्यर्थ विवाद को थोड़ा सा भी अवकाश नहीं है। इसमें

३० पंचदशी

जिन महावाक्यों का उल्लेख है वे सभी प्राणियों के अन्दर गुप्तभाव से रहनेवाले 'पूर्ण अहं' का वर्णन करनेवाले हैं। क्षुद्र अहं ने जीवात्माओं को संकुचित कर रखा है। विचार की आँच से जब क्षुद्र अहं जल जाता है तब वही पूर्ण अहं प्रत्यक्ष दर्शन दे देता है। आंख का पलक खुलते ही जैसे अनन्त आकाश आंखों के सामने आ खड़ा होता है इसी प्रकार क्षुद्र अहं को हटाते ही अनन्त आत्मतत्व साधक को दीखने लग पड़ता है। उसी पुण्य- कीर्ति अवस्था की ओर संकेत करनेवाले ये महावाक्य हैं। जितने भी वेदादि सच्छास्त्र हैं वे इसी पूर्ण अहं की आवाजें हैं। मनन में गहरे उतरे हुए लोगों को ही ऐसी ईश्वरीय आवाजें सुनाई पड़ा करती हैं। इसी कारण वेदों को 'अपौरुषेय' कहा जाता है। वेदों को कोई पुरुष बनाता नहीं किन्तु ये तो शुद्ध मन से सुनने की बातें हैं। इसी लिये वेदों को ऋषियों के द्वारा प्रकट होना बताया जाता है। इस प्रकरण में जिन 'महावाक्यों' का वर्णन है उनकी मृतप्राय आवाजें जनसाधारण के हृदयों में भी सुनाई तो पड़ती हैं, परन्तु वे अपने क्षुद्र अहंकार के परवश होने के कारण इनको अनसुनी कर देते हैं। सभी प्राणी अपने जी में अपने आप को बड़े से बड़ा और अच्छे से अच्छा मानते हैं। सभी को अपना आपा सर्वगुणसम्पन्न और सब से अच्छा, प्रतीत होता है। सभी अवसर पाते ही अपनी बड़ाई बघारने से चूकते नहीं हैं। परन्तु ऐसी सर्वहृदयेश्वरी महत्ता का जो गुप्त कारण है उसका किसी को भी पता नहीं है। हम तो इसी गुप्त महत्ता को ही सोया पड़ा हुआ 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते हैं। अन्दर जो निःशब्द भाषा में 'अहं ब्रह्मास्मि' की अखण्ड रटना चल रही है, उसी से यह प्राणी अपने को सर्वोत्तम समझ रहा है। हमारे रोम रोम में

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३१

'अहं ब्रह्मास्मि' यह महामन्त्र समाया हुआ है। मौत ने सारे संसार को अपने जबड़े में दबा रक्खा है परन्तु उस मौत को भी निगल जानेवाला यह अन्दर का 'अहं ब्रह्मास्मि' कभी मरना जानता ही नहीं। इस अन्दर के 'अहं ब्रह्मास्मि' को इस मांस की चादर ने लपेट रक्खा है। अब तो हमें क्षुद्र देहाभिमान के रूप में इस 'अहं ब्रह्मास्मि' की निर्बल (मुरदा) आवाज़ कभी कभी सुनाई पड़ जाती है। अब इसमें ब्राह्मतेज नहीं रह गया है। अन्दर के इस 'अहं ब्रह्मास्मि' को—सोये पड़े हुए इस ओम् को— हम साधकों को धीरतापूर्वक जगाना पड़ेगा। जब यह पूरा पूरा जाग उठेगा और इस मांस की चादर को तोड़ फोड़ डालेगा, तब यह देहाभिमान को, किंवा क्षुद्र अहंकार को जलाकर राख कर देगा। देहाभिमान के जलने का बहाना पाकर यहीं 'अहं ब्रह्मास्मि' फिर ब्रह्माण्ड भर में फैल जायगा और इस अनन्त ब्रह्माण्ड पर फिर अपना एकछत्र आधिपत्य जमा लेगा। ऐसी दिव्य अवस्था जब आ जाती है तब ही 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि महावाक्यों के बोलने का सच्चा अधिकार प्राप्त होता है। नहीं तो कोरे शाब्दिक [शास्त्रीय] ज्ञान से कुछ भी होने जाने वाला नहीं है। गुड़ कहने मात्र से किसी का मुँह मीठा नहीं हो जाता है—राम राम रटने से तोता मुनि नहीं हो जाता है। ऐसी दिव्य अवस्था जब आती है तब शान्ति का अनन्त समुद्र उमड़ पड़ता है। तब शोक भय दीनता आदि ठहर नहीं पाते हैं। जिन लोगों के पवित्र मानस में इस तरह के अपौरुषेय महावाक्य सुनाई पड़ने लगते हैं, जिनके हृदय में पूर्णता की गुंजार रहने लग जाती है, वे ही मुनि हैं, वे ही जीवन्मुक्त हैं, उनको ही विदेह मुक्ति मिल सकती है। जिसकी वाणी के पीछे अनुभव का बल नहीं

३२ पञ्चदशी होता है ऐसी निस्तेज वाणी से बोले हुए 'अहं ब्रह्मास्मि' आदि . महावाक्य उसी तरह बन्धनकारक होते हैं, जिस प्रकार अन्य अपशब्द बन्धनकारक होते हैं। क्योंकि अनुभव रहित पुरुष जब इन महावाक्यों को कहते हैं तब वे आत्मघात कर बैठते हैं क्योंकि उनमें दम्भ आदि दोष बहुतायत से उत्पन्न हो जाते हैं। मुख्य महावाक्य. चार हैं। एक 'प्रज्ञानं ब्रह्म' दूसरा 'अहं ब्रह्मास्मि' तीसरा 'तत्त्वमसि' चौथा 'अयमात्मा ब्रह्म' ब्रह्म और आत्मा की एकता रूप जो मोक्ष का साधन है-उसका ज्ञान इन ( या इन जैसे ) वाक्यों से ही हो पाता है। आत्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है, यह ज्ञान तो युक्ति से भी हो जाता है। परन्तु 'यह आत्मा और वह ब्रह्म तत्व दोनों एक ही तत्व हैं, इस बात को जानने का उपाय शब्द प्रमाण के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। प्रज्ञानँ ब्रह्म चक्षु और श्रोत्र के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा ज्ञान है, उसी से तो यह संसार रूपादि पदार्थों को देखा करता है और शब्दों को सुना करता है। नासिका के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है अन्तःकरण की उस वृत्ति से उपहित जो चैतन्य किंवा प्रज्ञान है, उसी प्रज्ञान से तो यह संसार भले बुरे गन्धों को सूँघा करता है। वागिन्द्रिय से ढके हुए उसी चैतन्य किंवा प्रज्ञान से ये सब शब्द बोले जाते हैं। रसना के द्वारा जो अन्तःकरण की वृत्ति बाहर निकलती है, उसको जिस चैतन्य ने अपनी उपाधि बना लिया है, उसी से तो ये स्वादु या अस्वादु रस पहचाने जाते हैं। इतना ही नहीं और भी

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३३ इन्द्रियों तथा अन्तःकरण की वृत्तियों से जिस चैतन्य किंवा जिस प्रज्ञान की सूचना जब-तब मननशील पुरुष को मिला करती है उसी को हम 'प्रज्ञान' कह रहे हैं। ब्रह्मा इन्द्र देवता मनुष्य तथा पशु पक्षियों तक में यही ऊपर कहा हुआ प्रज्ञान व्याप्त हो रहा है। वेदादि सब इसी प्रज्ञान सूर्य की बिखरी हुई किरणें हैं। इसी के सहारे से जगत् के जन्म स्थिति और प्रलय हो रहे हैं—इस कारण कहना पड़ता है कि सर्वान्तर्यामी यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्मतत्व है। क्योंकि सर्वत्र व्याप्त यह 'प्रज्ञान' ही ब्रह्म है, इसी से मैं मुमुक्षु अब यह बात बेधड़क होकर कह सकता हूँ कि मुझ में जो 'प्रज्ञान' है वह भी ब्रह्मतत्व ही है। आज से मैं इस महामहिम 'प्रज्ञान' पर झूठा अहंकार ( क्षुद्र अहंकार ) करना छोड़ देता हूँ। इतना जान चुकने पर भी यदि मैं इस सर्वत्र व्याप्त 'प्रज्ञान' पर क्षुद्र अहंकार करूँगा तो मैं ब्रह्मद्रोही हो जाऊँगा। व्यापक ब्रह्म को क्षुद्र अहम् में परिच्छिन्न करने का घोर पातक मुझे लगेगा। अहं ब्रह्मास्मि यों सिद्धान्तरूप से तो सभी देहों में वह परात्मतत्व परिपूर्ण हो रहा है और सभी की बुद्धियों का साक्षी भी है। सभी प्राणी अपने को सबसे बड़ा और सब से अधिक गुणी मान कर 'अहं ब्रह्मास्मि' की रटन अज्ञानपूर्वक करते ही रहते हैं। परन्तु इतने मात्र से साधक का कुछ भी उपकार नहीं हो पाता। जब तो किसी साधक को उसके साथ ही यह स्फूर्ति [प्रतीति] भी हो जाय कि वह सर्वत्र परिपूर्ण परात्मतत्व ही मेरी बुद्धि का साक्षी है, तो वैसे स्फूर्ति- युक्त आत्मा के विषय में ही हम 'अहम्' [मैं] शब्द कह रहे हैं। जब कोई साधक अपने ऊपर पड़ी हुई अविद्या की चादर को बार बार उतार कर फेंकने लगता है, जब कोई साधक मांस के झोंपड़े

३४ पंचदशी में से निकल कर बार बार बाहर बैठने लगता है, तब उस साधक को ही हम अहम् ['मैं'] कहना चाहते हैं। देश काल या वस्तु के परिच्छेद में न आने वाली स्वभाव से ही परिपूर्ण जो वस्तु है वह 'ब्रह्म' कही जाती है। इस 'मैं' को और उस 'ब्रह्म' को परस्पर एक बता देना 'अस्मि' इस तीसरे पद का काम है। जिसका भाव यही होता है कि मैं (साधक) ब्रह्मतत्व ही हूँ अथवा मैं साधक ही तो ब्रह्म हूँ। अविद्या के प्रताप से जो मैं अपने आप को संसारी आदि मान बैठा था वह कुछ भी मैं नहीं हूँ। देहेन्द्रि- यादि की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि में उलझा रह जाने वाला, देहेन्द्रियादि के साथ जल मरने वाला क्षुद्र प्राणी मैं कदापि नहीं हूँ। अथवा अविद्या के प्रताप से जो मैं ब्रह्मतत्व को अपने से पृथक्—सातवें आसमान पर रहने वाला—तत्त्व मान बैठा था वह ब्रह्मतत्व मुझ से पृथक् पदार्थ नहीं है। तत्त्वमसि जो अभी तक वृथा ही [नामालूम क्यों] शरीरों के वेष्टनों से लिपटा पड़ा था, जो शरीरों के साथ वृथा ही बार बार मर और जी रहा था, श्रवणादि का अनुष्ठान करके महावाक्य के समझने की योग्यता अब जिसमें आ गयी है, जो तीनों देहों से अलग रहने लगा है, जो तीनों देहों के साक्षी की हैसियत में आ गया है, उसी को हम लक्षणावृत्ति से 'त्वं' अर्थात् 'तू' कह रहे हैं। सृष्टि बनने से पहले सम्पूर्ण भेदों से रहित जो एक नामरूप रहित वस्तु थी, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी जो वस्तु वैसी की वैसी ही है, जिस सद्वस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है, उसी निर्विकार सद्वस्तु को हम लक्षणावृत्ति से 'तत्' अर्थात् 'वह' कह रहे हैं। इन दोनों शब्दों के लक्ष्यार्थों की जो छिपी हुई एकता है

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५

महावाक्यविवेक का संक्षेप ३५

उसी गुप्त एकता का ग्रहण असि [ है ] यह पद करा रहा है। परन्तु कितना ही प्रयत्न करो इस लक्ष्यार्थ तक तो केवल अधिकारी लोगों की ही उदार दृष्टि पहुँचेगी । दूसरे अनधिकारी लोग तो इस महावार्ता को हँसी में ही टाल देंगे और परम पद के साथ खिल- वाड़ कर बैठेंगे । मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि 'तत्' 'त्वं' पदों की जो एकता प्रमाणपुष्ट हो चुकी है, उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें, और वैसा अनुभव करके अनादिकाल की इस वृथा खटपट को भूल जांय । वे अनुभव करें कि क्या हम अनादि काल से इसी भवजाल में उलझे रहने को यहां उतरे हैं ? क्या इस संसार की वेमतलब उखाड़ पछाड़ ही हमारे इस जीवन का चरमलक्ष्य है ? या हमारा अपना कोई स्थायी रूप भी है ? जिसके कि आधार से हमको शान्ति के सुखद दर्शन मिल सकते हैं। इसी गम्भीर प्रश्न का उत्तर तत्त्वमसि [ तुम तो वह हो, तुम्हें तो इस खटपट की कुछ भी आवश्यकता नहीं है ] यह महावाक्य दे रहा है । अयमात्मा ब्रह्म जो तत्व स्वयंप्रकाश होने के कारण ही यद्यपि सबको प्रत्यक्ष हो रहा है परन्तु हुआ करो, फिर भी मायामोहित प्राणी ने इस स्वयंप्रकाशतत्व की भी ऐसी उपेक्षा की है जैसी कदाचित् शत्रुओं की भी कोई न करता हो। कोटिजन्मों के पुण्यों के परिपाक से जब किसी साधक की सूक्ष्म दृष्टि उस तत्व तक जा पहुँचे तब सूक्ष्म दृष्टि से पकड़ लिये हुए उसी तत्व को हम अयम् [यह] कह रहे हैं-अर्थात् यह तत्व कभी किसी से छिपता नहीं है और यह कभी किसी का दृश्य नहीं होता है। अहंकार,प्राण,मन इन्द्रिय तथा देह का जो समूह है, उस सभी का अधिष्ठान, सभी क

३६ पंचदशी साक्षी, सभी से प्रत्यक्, सभी से आन्तर, जो कोई तत्व है उसी को हम 'आत्मा' कहते हैं। यह जो आकाशादि संसार हमें दीख रहा है यह सब क्षणभंगुर है। यह क्षणभंगुर संसार अपने स्वभाव के अनुसार जब शेष नहीं रह जायगा, तब जो तत्व शेष बचेगा उस तत्व को ही हम 'ब्रह्म' कहते हैं। वह ब्रह्मतत्व साधक की समझ में आया हुआ, यह ऊपर कहा हुआ,खयंप्रकाश आत्मा ही तो है। इस आत्मा से भिन्न कोई ब्रह्मनाम का पदार्थ होता होगा यह विचार प्रमाणानुमोदित नहीं है। इस आत्मा से भिन्न किसी को ब्रह्म समझना भारी से भारी भूल है।

6. Chitradipa

[६] चित्रदीप का संक्षेप तसवीर वाले कपड़े की जैसे चार अवस्थायें हैं—धुला हुआ, मांडी लगाया हुआ, चिह्न किया हुआ और रंगभरा हुआ, इसी प्रकार परमात्मा में भी चार अवस्थायें हैं ( १ ) चेतन ( २ ) अन्तयोमी ( ३ ) सूत्रात्मा ( ४ ) तथा विराट् । खयं तो वह चेतन है, माया का ध्यान करें तो वह 'अन्तर्यामी' है, सूक्ष्म सृष्टि को देखें तो वह 'सूत्रात्मा' कहाता है, स्थूल सृष्टि पर दृष्टि डालें तो उसे विराट् कहना होगा । जो देव मनुष्य पशु आदि के शरीर चैतन्य में अध्यस्त हैं, उनमें जीव नाम के जो चिदा- भास पड़े हैं ये ही तो संसार में भ्रमण कर रहे हैं । चेतनतत्व व्यापक है, पर है, अखण्ड है, वह तो संसार भ्रमण कर ही नहीं सकता । जीव के संसार को ही जो कि चेतन का संसार समझते हैं वे सब भूलते हैं । चिदाभास के विषय में ज्ञातव्य बात यह है कि—देहों में ही चिदाभास पड़ता है, मिट्टी पत्थर आदि में चिदा- भास नहीं पड़ता । जीवभाव अविद्या के कारण उत्पन्न होता है । दीखनेवाला संसार 'परमार्थ है, सब अपने आपे में लगे हैं, ऐसा सम- झना ही 'अविद्या' है—यही बेसमझी है। यह संसार जीव का है 'आत्मतत्व का संसार हो ही नहीं रहा, ऐसा ज्ञान 'विद्या' कहाती है। यह विद्या विचार करते रहने से हाथ आजाती है । उसको पाने के लिए जगत्, जीव और परात्मा का विचार सदा ही करना चाहिये । जीवभाव और जगत् भाव जब हट जायगा, तब आत्मा ही आत्मा

३८ पञ्चदशी

शेष रह जायगा—तब कैवल्य आ धमकेगा। आत्मतत्व केवल रूप में ज्योंही आ विराजेगा त्यों ही विचार स्वयं छूट जायगा। आत्मतत्व को केवल रूप में लाने के लिये विचार की सहायता की ज़रूरत पड़ती है, उसके लिये आत्मतत्व पर थोड़ा सा विचार करलें। 'कूटस्थ' और 'जीव' तथा 'ब्रह्म' और 'ईश्वर' यों चार तरह का चेतन,चेतनतत्व को समझने के लिये कल्पित कर लिया है। दोनों देहों के अन्दर जो चेतना रहती है, उसमें तो कभी भी कोई विकार नहीं आता। उतनी चेतना 'कूटस्थ' चेतना कहाती है। उस कूटस्थ चेतना में पहले बुद्धि की कल्पना हुई, फिर उसमें चेतना का प्रतिबिम्ब पड़ा; फिर उसमें प्राणशक्ति उत्पन्न हुई, बस यही जीव है। यही संसार में फंसने वाली चीज़ है। इसने अन्दर के कूटस्थ चेतन को पूरा पूरा ढक डाला है। अब तो यह इस तत्व को पृथक् रूप में कभी भी नहीं जानता। इसका यह न जानना, अनादि काल से है। यही 'मूलाज्ञान' कहाता है। यह अज्ञान दो रूप में काम करता है—एक तो यह स्वरूप को ढकता है, दूसरे यह स्वरूप को किसी विकृतरूप में (शरीर आदि के रूप में) दिखाता है। यही 'आवरण' और 'विक्षेप है'। आवरण से अपने रूप की प्रतीति रुक जाती है-- अपना आपा दूसरे पदार्थों में रिलमिल जाता है। ये दोनों ही बातें तत्वज्ञान होते ही नष्ट हो जाती हैं। परन्तु विक्षेप के नष्ट होने में, तत्वज्ञान के बाद भी कुछ समय लगता है। क्योंकि विक्षेप की उत्पत्ति कर्मों से और अज्ञान से, दो से मिल कर होती है। कर्मों का प्रभाव जितने दिनों तक रहना चाहिये, उतने दिन रहकर ही विक्षेप नष्ट होता है। यही कारण है कि ज्ञान हो जाने पर भी ज्ञानी का प्रारब्ध कर्म नष्ट नहीं होता। आत्मा के

चित्रदीप का संक्षेप ३९ विषय में लोगों को बहुत से भ्रम हैं कोई इसको कुछ मानता है और कोई कुछ। इसके परिमाण के और स्वरूप के विषय में भी बहुत से विवाद हैं। सारे विचारों में जो सार है वह तो यही है कि मायी महेश्वर है और माया उसका एक औज़ार है। उस माया का जो अधिपति है उसके [कल्पित] अवयवों ने इस सब जगत् को व्याप्त कर रक्खा है। उसकी इस माया पर यदि कुछ विचार न करें तो यह सच्ची मालूम होती है, विचार करें तो वह अनिर्व- चनीय सिद्ध होती है, श्रुति का कहना मानें तो यह तुच्छ है। यह माया शक्ति चेतन के बिना प्रतीत नहीं होती, इससे यह स्वतन्त्र नहीं है, तथा असंग को ससंग बना देने के कारण यह स्वतन्त्र भी है। जब तक माया को समझ लिया नहीं जाता, तब तक आश्चर्य मालूम होता है। जब यह समझ में आ जाती है तब माया समझ लेने से ही आश्चर्य नहीं रहता। निद्रानाम की जो जीव की माया है, उसमें जैसे कोई कानून लागू नहीं हो सकता—वह जैसी दीखे वैसी ही ठीक है। इसी प्रकार यह माया जैसी उल्टी-सीधी दीखे वैसी ही ठीक है। इसको तर्क की कसौटी पर कसने से इसके स्वरूप को समझने में चूक हो जायगी। श्रद्धा के मार्ग से चलते-चलते जो बात ज्ञान के यौवन में दीखने वाली थी उन्मार्ग में पड़ जाने से उससे वंचित रह जाना पड़ेगा। सम्पूर्ण आक्षेप जगत् को सत्य मानने वालों पर ही लागू हो सकते हैं। नींद की तरह माया पर कोई आक्षेप चल नहीं सकता। माया पर आक्षेप न करके उसको तो हटाने के उपाय सोचने में ही आत्मकल्याण है। जिसका निरूपण न हो और दीखे भी 'लौकिक माया' का यह लक्षण इस 'ऐश्वरी माया' में भी है। जिस कारण में अचिन्त्यरचना की शक्ति है, उस माया

४० पंचदशी नाम के बीज का अनुभव सुषुप्ति में सभी को होता है। बीज में पेड़ की तरह सारा जगत् उस सुषुप्ति में लीन रहता है। उस माया में सारे जगत् की वासनायें रहती हैं। उन वासनाओं में जो चैतन्य है वह स्पष्ट नहीं होता। इसी से अपनी वासनाओं का पता किसी को नहीं होता कि वे कैसी कैसी हैं। चेतन के आभास से युक्त वह माया ( अज्ञान ) जब बुद्धिरूप में प्रकट होती है तब उसमें का वह चिदाभास स्पष्ट मालूम होने लगता है। जब वासनाओं की बुद्धिवृत्तियें बन जाती हैं तब मालूम होता है कि ऐसी वासना भी इसमें थी। माया के अधीन जो चिदा- भास है वही तो वेदों का 'महेश्वर' है, वही 'अन्तर्यामी' है, वही 'सर्वज्ञ' है, वही 'जगत् का कारण' भी कहाता है। यह जिस मानस या बाह्य जगत् को बना लेता है, उसे बदल देने का सामर्थ्य किसी में नहीं है, यही तो इस की सर्वेश्वरता है। इसी कारण से जिस पर जो धुन सवार हो जाती है वह किसी के समझाने से हटती नहीं है। इस सुषुप्ति के अज्ञान में ही सम्पूर्ण प्राणियों की बुद्धियों की वे सब वासनायें रहती हैं जिन्होंने इस सब जगत् को घेर रक्खा है। सारा जगत् इन्हीं सूक्ष्म वासनाओं के अधीन होकर अपने अपने कार्यों में संलग्न हो रहा है। इसी से उसे 'सर्वज्ञ' कहा है। इसकी सर्वज्ञता का ज्ञान हमें क्यों नहीं होता, इसका कारण तो यह है कि वासनाओं का प्रत्यक्ष ज्ञान हमें किसी को भी नहीं होता है। जो जो विषय सामने आते जाते हैं उन-उन विषयों की वासनायें प्रकट होती जाती हैं। यों एक काल में न सही किन्तु कालान्तर में सर्वविषयानुभावी होने से उसकी सर्वज्ञता सिद्ध होती है। यों एक समय में उसकी सर्वज्ञता की प्रतीति न होने से उसके सर्वज्ञपन का प्रत्यक्ष नहीं होता। उसको

जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा-

चित्रदीप का संक्षेप ४१

तो अनुमान से जानना पड़ता है। विज्ञानमय आदि कोशों में तथा अन्यत्र भी अन्दर रहकर यह तत्व उन उन का नियमन करता रहता है इसी से उसे 'अन्तर्यामी' कहा जाता है। धागा जैसे उपादान रूप से पट में रहता है, इसी तरह सब-का उपा- दान होने से यह तत्व सर्वत्र ही रहता है। धागा जब हिले तब पट अवश्य हिलता है, इसी प्रकार यह अन्तर्यामी तत्व जिस पदार्थ की वासना से प्रभावित हो जाता है, वह वह कार्य अवश्य ही होकर रहता है। इस अन्तर्यामी में यदि घट की वासना जाग उठे तो घट अवश्य बनता है। इसी भाव से गीता में हृदय में बैठ कर सब यन्त्रारूढ भूतों को घुमाने की बात कही है। वही ईश्वर तत्व पुरुषार्थ का रूप धरकर भी आता है, इसका कारण पुरुषार्थ भी व्यर्थ नहीं होता है। अन्तर्यामी की यह प्रेरणा ध्यान में भले प्रकार आ जाय तो आत्मतत्व का असंगपना भी समझ में आ ही जायगा। इसकी असंगता के ज्ञान से मुक्ति के मिलने की बात जहां-तहां शास्त्रों में कही ही है। यही ईश्वर प्राणियों के कर्मों की अपेक्षा करके कभी तो जगत् को उत्पन्न कर देता है और कभी उसे अपने अन्दर छिपा लेता है। जगत् के पदार्थों के सृष्टि और प्रलय तो ठीक ऐसे हैं जैसे हमारे दिन रात, हमारे जागरण और स्वप्न या हमारे उन्मेष और निमेष या हमारे मौन और मनोराज्य हों। यह ईश्वर और वह ब्रह्मतत्व एक नहीं है। परन्तु सर्वसाधारण को इस भेद का पता नहीं है। वे इन दोनों को एक ही समझते हैं। शास्त्रों का तात्पर्य तो यही है कि ब्रह्मतत्व असंग है। जगत् का सर्जन करनेवाला महेश्वर तो मायावी है। अब दूसरा जो 'सूत्रात्मा' है उसके विषय में भी सुनिये—