पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ
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द्वैतविवेक का संक्षेप २५
बन्धन करेगा ही। मानसद्वैत को सदा के लिये नष्ट कर देनेवाला
उपाय, ब्रह्मतत्व का—अपने व्यापक आत्मतत्व का—ज्ञान ही है।
ईश्वर का द्वैत आंखों के सामने खड़ा भी रहे परन्तु उसको मिथ्या
( बाधित होजाने वाला ) समझ लेने से ही, पारमार्थिक अद्वैत का
ज्ञान हो सकता है। जब पारमार्थिक अद्वैत का ज्ञान हो जाता
है तब मानससंसार का बनना सदा के लिये रुक जाता है।
जब प्रलय हो जाती है—जब अद्वैत ज्ञान करानेवाले गुरु
या शास्त्र नहीं रह जाते और जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करने
वाला द्वैत नहीं रहता है—तब तो अद्वितीय तत्व समझ में आ
ही नहीं सकता। अद्वैत तत्व तो तभी समझ में आता है जबकि
इसका विरोधी द्वैत सामने दिखाई देता हो। यदि द्वैत दिखाई
न देता हो तो अद्वैत जैसे गहन तत्व को जानने का कोई साधन
ही हमारे पास नहीं रह जाता। यों ईश्वर का निर्मित द्वैत अद्वैत-
ज्ञान का बाधक ही नहीं है प्रत्युत साधक भी है। सत्य संकल्प
उस ईश्वर के बनाये हुए उसको हटा देना हम अल्पशक्ति जीवों के
वस का काम भी तो नहीं है। कोई कोई साधक यह मनाया
करते हैं कि स्त्री बच्चे मर जांय तो मैं छूट जाऊँ। उनको यह सम-
झना चाहिये कि ईश्वर के संकल्प से उत्पन्न हुए स्त्री बच्चे तभी
मरेंगे जब ईश्वर का संकल्प पूरा हो जायगा। इन निष्फल संकल्पों
से क्या होना है ? करने की बात तो केवल इतनी ही है कि
तुम उनको अपना मानना छोड़ दो। हमारा इनसे जो मानस
सम्बंध है उसी से तो.हम बँध रहे हैं। उसे न हटाकर, ईश्वर
की चीज़ को बिगाड़ने की इच्छा तो उपहासास्पद इच्छा ही है।
हमको तो इस ईश्वर के द्वैत के रहते रहते ही अपना अद्वैत मार्ग
साफ़ कर लेना.है। इससे द्वेष करना ठीक नहीं है। जैसे मानस