पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 614, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ पंचदशी द्वैत से राग करना बन्धनकारक है वैसे ही ईश्वर के द्वैत से द्वेष करना भी बन्धनकारक ही है। जीव के द्वैत के दो भेद हैं—एक शास्त्रीय दूसरा अशास्त्रीय। आत्मा और ब्रह्म का विचार शास्त्रीय मानस जगत् है। इस द्वैत को तत्वज्ञान हो चुकने के बाद छोड़ देना चाहिए। अशास्त्रीय द्वैत के दो भेद हैं—एक काम क्रोध आदि, दूसरा मनोराज्य। ये रहेंगे तो तत्वज्ञान होगा नहीं। किसी तरह तात्कालिक उपाय कर देने से यदि ज्ञान हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं। तत्वज्ञान के बाद जीवन्मुक्ति की अवस्था आनी ही चाहिये। उसमें गीता वाली दैवी संपत्ति आनी ही चाहिए। जो पुरुष काम क्रोधादि के झंझटों में उलझा पड़ा है, उसका ज्ञान 'ज्ञान' नहीं है। वह मुक्ति रूप फल को देनेवाला नहीं है। वह तो कोरा ( बन्ध्य ) ज्ञान है। ज्ञान हो जाय और काम क्रोध आदि न छोड़े जांय, व्यवहार में शुद्धि न आजाय, ज्ञानी का व्यवहार यह न कहने लग पड़े कि इसके व्यवहार में देहात्मवाद काम नहीं कर रहा है, तो वह ज्ञान ऐसा ही निर- र्थक है जैसे कि औषध सेवन करके पथ्यसेवन न किया जाय। जिसके मन से विषयसुख की लालसा नहीं मिटी है उसको हज़ार ज्ञान होजाय तौ भी उसकी जन्मपरम्परा टूटनेवाली नहीं है। जो ज्ञानी होकर भी कामादि को नहीं छोड़ता है उसका बहुत बड़ा पतन होता है। कारण यह है कि अज्ञानी लोग जिस ईश्वर तत्व से डरकर या कर्मगति से भय मानकर पाप-कर्म से बचते हैं वह भय तो इसके मन से जाता रहता है। ऐसा ज्ञानी अवश्य ही पतित हो जाता है। ज्ञान होने से पहले मनो- दोष अज्ञानी को सताते हैं, अब ऐसे कोरे ज्ञानी की लोक में निन्दा भी होने लगती है। यों इस शुष्क ज्ञान से तो वह अज्ञान