भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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व्यवहार होते हैं। परन्तु जाग्रत् समय के मनोमय पदार्थों को अत्यन्त सावधानी से जान लेना चाहिये। जब हमारा मन किसी पदार्थ को देखता है, तब वह उसी पदार्थ के रूप का हो जाता है। आंख बन्द करके ध्यान करते ही वही रूप हमारे मन में दीखा करता है। यों जब हम जागरण के समय किसी पदार्थ को देखते हैं तब वहां दोहरे पदार्थ होते हैं—जैसे एक मिट्टी का घड़ा दूसरा मन का घड़ा। मिट्टी के घड़े को तो हम प्रमाणों से जानते हैं। परन्तु हमारा मनोमय घड़ा प्रमाणों से नहीं दीखता। वह तो साक्षी आत्मा से प्रकाशित हुआ करता है। हमको जो वस्तु बन्धन में डालती है वह यह 'मनोमय' ही तो है। यह हो तो सुख दुःख होते हैं, नहीं तो नहीं होते। बाह्य पदार्थ नहीं भी होते, तब भी सुपने आदि में मनोमय पदार्थों से जीव को सुख दुःख हो जाते हैं। सुपने की मनोमयी स्त्री के संग से वीर्यपात हो जाता है। समाधि, सुषुप्ति या मूर्छाकाल में बाह्यपदार्थ बने भी रहते हैं, परन्तु तब मनोमय पदार्थ न होने से जीवों को सुख दुःख नहीं होते। पुत्र दूरदेश में गया हो और वह जीता हो तब उस का पिता वंचक के कहने से उसे मरा समझ कर रो देता है। क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ मर गया है। पुत्र मर भी गया हो परन्तु उसका समाचार न मिला हो तब नहीं रोता। क्योंकि उसका मनोमय पदार्थ तो जीवित ही है। यों यह स्पष्ट है कि मानस जगत् ही बन्धन करने वाला है। इस मानस द्वैत को नष्ट करने के दो उपाय हैं एक 'योग' दूसरा 'ज्ञान'। योग में मनोनिरोध करना पड़ता है, उससे मानस संसार बनना रुक तो जाता है, परन्तु वह बीजरूप में तो रहता ही है। जब भी मनो- निरोध करना छोड़ेंगे, तुरन्त मानस द्वैत आ खड़ा होगा और वह