भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[header] द्वैतविवेक का संक्षेप २३ पिलाकर निकालते हैं वही काम कछवी अपने संकल्प से कर डालती है। संयम करते करते संयमी लोगों के संकल्प में फिर कर्म की शक्ति आ जाती है। संकल्प में से ही तो कर्म में बल आता है। तत्त्वज्ञानी के कर्म में और संकल्प में दोनों जगह बल रहता है। ईश्वर को कर्म करना ही नहीं पड़ता। उसको केवल संकल्प करना पड़ता है। बस कर्म अपने आप हो जाता है। यों वे संकल्प से सृष्टि बना लेते हैं। जब जीवात्मा इस ईश्वरोत्पादित जगत् के विषय में अपने मनोवृत्ति नाम के संकल्प दौड़ाता है, तब यह जगत् उसके भोग का साधन बनता है, नहीं तो नहीं बनता। ईश्वर तो मणि को एक ही तरह का बनाते हैं, परन्तु जिसको वह मिलती है, वह हर्ष करता है। जिसे नहीं मिलती, वह पछताता है। कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें न पाने का हर्ष होता है और न उन्हें न मिलने का पछतावा ही होता है। यों एक मणि में तीन आकार सिद्ध होते हैं —एक 'प्रिय' दूसरा 'अप्रिय' तीसरा 'उपेक्ष्य'। ये तीनों ही आकार जीवों की भिन्न- भिन्न बुद्धियों के अनुसार ही होते हैं। इन आकारों के बनाने में ईश्वर का हाथ सर्वथा नहीं होता। देखते हैं कि सम्बन्धियों के भेद से एक ही स्त्रीपिण्ड दादी, माता, पत्नी, पुत्री, पौत्री आदि अनेक रूपों में देखी जाती है। वह जो ईश्वरनिर्मित मांसमय स्त्रीपिण्ड है, वह तो अवश्य ही एक तरह का रहता है, परन्तु मनोमयी स्त्रियां एक में ही अनेक हो जाती हैं। क्योंकि भोक्ताओं के मन भिन्न-भिन्न होते हैं। श्रम के समय में, मनोराज्य के समय में और स्मृति के समय म तो मनोमय पदार्थों से ही हमारा व्यवहार होता है। इन अवस्थाओं में ईश्वर का बनाया पदार्थ होता ही नहीं। जाग्रत् काल में भी मनोमय पदार्थों से ही