भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( १६३ बलवान्‌से तिरस्कृत हो विदेशगमन अथवा उसका आश्रय करनाही नीति है सो देशका त्याग करना उचित है। अथवा आत्मा सामादि उपायोंसे रक्षाके योग्य है। कहा है- अपि पुत्रकलत्रैर्वा प्राणान्रक्षेत पंडितः । विद्यमानैर्यतस्तैः स्यात्सर्वं भूयोऽपि देहिनाम् ॥ ३८८ ॥ पंडित पुत्र और कलत्रोंकेभी जानेसे प्राणोंकी रक्षा करे, कारण कि, प्राणोंके रहनेसे देहधारियोंको फिरभी सब होजाते हैं ॥ ३८८ ॥ तथाच- आर देखो- येन केनाप्युपायेन शुभेनाप्यशुभेन वा । उद्धरेद्दिनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ ३८९ ॥ जिस किसी शुभ वा अशुभ उपायसे दीन आत्माका उद्धार करना, कारण कि, समर्थ होकर धर्म करसकेगा ॥ ३८९ ॥ यो मायां कुरुते मूढः प्राणत्यागे धनादिषु । तस्य प्राणाः प्रणश्यन्ति तैर्नष्टैर्नष्टमेव तत् ॥ ३९० ॥” जो मूर्ख प्राणत्यागमे धनादिकोंमें ममता करता है उसके प्राण नष्ट होते हैं उनके नष्ट होनेमे वह सब नष्टहीही ॥ ३९० ॥” एवमभिधाय दमनकः करटकसकाशमगमत । करट- कोऽपि तमायान्तं दृष्ट्वा प्रोवाच- "भद्र ! किं कृतं तत्र- भवता ? " दमनक आह- " मया यावत् नीतिबीजानि- र्वापणं कृतं परतो दैवविहितायत्तम्। उक्तञ्च यतः- यह कह दमनक करटकके समीप गया। करटक उसे आया देखकर बोला- "भद्र ! क्या किया आपने ?" दमनक बोला- "मैने तो नीतिबीज बोदिया आगे करना दैवके आधीन है। क्योंकि कहाहै- पराङ्मुखेऽपि दैवेऽत्र कृत्यं कार्य्यं विपश्चिता । आत्मदोषविनाशाय स्वचित्तस्तम्भनाय च ॥ ३९१ ॥ दैवके पराङ्मुख होनेपरभी अपने दोष नाशकरने और स्वचित्तके स्तम्भन करनेके निमित्त बुद्धिमान्‌को कार्य करना चाहिये ॥ ३९१ ॥