भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( २३६ ) पञ्चतन्त्रम् । सो मैं इस प्रकारसे भक्षण करूं जैसे बहुत दिनोंतक मेरे प्राणोंकी यात्रा होगी । सो प्रथम स्नायु बंधन जो इसकी धनुषकोटिमें लगाहै उसे भक्षण करूं। कहाहै- शनैः शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् । रसायनमिव प्राज्ञैर्हेलया न कदाचन ॥ ८४ ॥” बुद्धिमानोंको स्वयं उपार्जन किया धन शनैः शनैः खाना चाहिये जैसे रसायन उसमें खेल करना नहीं चाहिये ॥ ८४ ॥” इत्येवं मनसा निश्चित्य चापघटितकोटिं मुखमध्ये प्रक्षिप्य स्नायुं भक्षितुं प्रवृत्तः । ततश्च त्रुटिते पाशे तालुदेशं विदार्य्य चापकोटिर्मस्तकमध्येन निष्क्रान्ता । सोऽपि तद्- वेदनया तत्क्षणात् मृतः । अतोऽहं ब्रवीमि- ऐसा मनमें विचारकर चापकी बंधी कोटिको मुखमें डालकर चबाने लगा । तब उस पाशके टूटतेही तालुदेशको विदीर्णकर धनुषका शिरा उसके मस्त- कमें निकल आया, वहभी उसकी वेदनासे तत्काल मरगया । इससे मैं कहताहूं- अतितृष्णा न कर्त्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत् । अतितृष्णाभिभूतस्य शिखा भवति मस्तके ॥ ८५ ॥ अति तृष्णा नकरे और तृष्णा त्यागन भी न करे अतितृष्णासे अभिभूत हुएकी मस्तकमें शिखा होती है ॥ ८५ ॥ स पुनरपि आह—“ब्राह्मणि ! न श्रुतं भवत्या । वह फिर बोला-“ब्राह्मणी ! तुमने न सुना कि- आयुः कर्मच वित्तञ्च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ ८६ ॥” आयु, कर्म, धन, विद्या और मरण यह पांच वस्तु देहीके गर्भमें निर्धारित कीजातीहैं ॥ ८६ ॥” अथ एवं सा तेन प्रबोधिता ब्राह्मणी आह,—“यदि एवं तदस्ति मे गृहे स्तोकं तिलराशिः । ततः तिलान् लुञ्चित्वा तिलचूर्णेन ब्राह्मणं भोजयिष्यामि” इति । ततः तद्वचनं श्रुत्वा ब्राह्मणो ग्रामं गतः । सापि तिलान् उष्णोदकेन संमर्द्य

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