पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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स्ततो निराहारतया पीडितः परिभ्रमन् तं प्रदेशमाज- गाम । यावत् वराहपुलिन्दौ द्वौ अपि पश्यति तावत् प्रहृष्टो व्यचिन्तयत् । "भोः ! सानुकूलो मे विधिः । तेन एतदपि अचिन्तितं भोजनमुपस्थितम् । अथवा साधु इदमुच्यते- किसीएक वनमें कोई पुलिन्द पापकी सम्पत्ति करनेको वनमें गया । तब जाते हुए उसने बडे अञ्जन पर्वतके शिखरकी समान एक शूकर प्राप्त किया । उसको देख कर्णपर्यन्त खेंचे हुए सायकसे मारा तब उसने ताडित हो क्रोधित चित्तसे बालचन्द्रवत् कान्तिमान् डाढोंसे उसका पेट फाड डाला जिससे वह म्लेच्छ प्राणरहित हो पृथ्वीपर गिरा । तब लुब्धकको मारकर शूकरभी बाणप्र- हारकी वेदनासे पञ्चत्वको प्राप्त हुआ, इसी अवसरमे कोई निकट मृत्युवाला शृगाल इधर उधर निराहार होनेसे पीडित हुआ, घूमता हुआ उस स्थानमें आया । जबतक शूकर और पुलिन्द दोनोंहीको देखता है तबतक प्रसन्नहो विचारनेलगा "अहो मेरे ऊपर विधाता प्रसन्न है इस कारण यह अचिन्तित भोजन प्राप्त हुआहै । अथवा यह अच्छा कहाहै- अकृतेऽप्युद्यमे पुंसामन्यजन्मकृतं फलम् । शुभाशुभं समभ्येति विधिना सन्नियोजितम् ॥ ८२ ॥ बिना उद्यम किये भी पुरुषोंको अन्य जन्मका किया हुआ शुभ वा अशुभ फल विधाताके नियोगसे प्राप्त होताहै ॥ ८२ ॥ तथाच- और देखो- यस्मिन्देशे च काले च वयसा यादृशेन च । कृतं शुभाशुभं कर्म तत्तथा तेन भुज्यते ॥ ८३ ॥ जिस देशकालमे जैसी अवस्थामे जिसने जैसा शुभाशुभ कर्म किया है वह वैसाही भोगताहै ॥ ८३ ॥ तदहं तथा भक्षयामि यथा बहूनि अहानि मे प्राणयात्रा भवति । तत् तावदेवं स्नायुपाशं धनुष्कोटिगतं भक्षयामि । उक्तञ्च-