भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( २७६ ) पञ्चतन्त्रम् । सुभाषितरसास्वादबद्धरोमाञ्चकञ्चुकाः । विनापि संगमं स्त्रीणां सुधियः सुखमासते ॥ १७८ ॥ सुभाषित गोष्ठीके रसरूपी स्वादसे जिनके रोमाञ्चरूप बखतर बंधे हुए- हैं वे बुद्धिमान् स्त्रियोंके संगके बिनाही सुखको प्राप्त होते हैं ॥ १७८ ॥ सुभाषितमयद्रव्यसंग्रहं न करोति यः । स तु प्रस्तावयज्ञेषु कां प्रदास्यति दक्षिणाम् ॥ १७९ ॥ जो सुन्दर वचनरूप द्रव्यका संग्रह नहीं करता है वह परस्पर आला- पके यज्ञमें किस दक्षिणाको देगा ( अर्थात् सभ्योंको किस प्रकार सन्तुष्ट कर सकेगा) ॥ १७९ ॥ तथाच- तैसेही- सकृदुक्तं न गृह्णाति स्वयं वा न करोति यः । यस्य सम्पुटिका नास्ति कुतस्तस्य सुभाषितम् ॥ १८० ॥ जो एकही बार उच्चारण किये वचनको नहीं ग्रहण करलेता वा स्वयं नहीं करता है और जिसको ( १ ) आवरण भेद नहीं है उसको सुभाषित किस प्रकार आ सकता है ॥ १८० ॥ अथ एकस्मिन्नहनि गोष्ठीसमये चित्राङ्गो न आयातः । अथ ते व्याकुलीभूताः परस्परं जल्पितुं आरब्धाः- "अहो ! किमद्य सुहृन्न समायातः ? किं सिंहादिभिः क्वापि व्यापा- दितः ? उत लुब्धकैः ? अथवा अनले प्रपातितो गर्त्ताविषमे वा नवतृणलौल्यादिति । अथवा साधु इदमुच्यते- तब एक दिन गोष्ठीके समय चित्रांग न आया तब वे सब व्याकुल हो परस्पर कहने लगे- "अहो ! आज हमारा सुहृद् क्यों न आया ? क्या कहीं सिंहादिने मारडाला वा व्याधोंने अथवा अग्नि वा कठिन गड्ढेमें गिरगया वा नव तृणके लोभसे ( कहीं गिरा ) ? अथवा सत्य कहा है- स्वगृहोद्यानगतेऽपि स्निग्धैः पापं विशङ्क्यते मोहात् । किमु दृष्टबह्वपायप्रतिभयकान्तारमध्यस्थे ॥ १८१ ॥" १ धारणा-सावधानीतियावत् ।

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