पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २९० ) पञ्चतन्त्रम् ।
जाकर प्रहार करें । सो इस विषयमें क्या करें सन्धि, विग्रह, यान ( चढाई ), आसन, संश्रय, द्वैधीभावमेंसे कोई एकका आश्रय करो । सो विचार कर आप शीघ्र कहो" तब वे बोले- "आपने युक्तही कहा है जो ऐसा प्रश्न किया। कहाहै- अपृष्टेनापि वक्तव्यं सचिवेनात्र किञ्चन । पृष्टेन तु ऋतं पथ्यं वाच्यञ्च प्रियमप्रियम् ॥ ४ ॥ इस जगत्में श्रेष्ठमंत्रीको बिना पूछे भी कुछ कहना चाहिये और पूछनेपर सत्य हितकारक प्रिय अप्रिय कहनाही चाहिये ॥ ४ ॥ यो न पृष्टो हितं ब्रूते परिणामे सुखावहम् । सुमन्त्री प्रियवक्ता च केवलं स रिपुः स्मृतः ॥ ५ ॥ जो पूछनेपर परिणाममें सुखदायक हितके वचन नहीं कहता है वह सुमन्त्री प्रियवक्ता केवल शत्रु जानना ॥ ५ ॥ तस्मादेकान्तमासाद्य कार्यो मन्त्रो महीपतेः । येन तस्य वयं कुर्मो निर्णयं कारणं तथा ॥ ६ ॥" इस कारण एकान्त स्थानको प्राप्त होकर राजाको सम्मति करनी चाहिये जिससे हम उस मंत्रका निर्णय तथा कारण कर सकें ॥ ६ ॥" अथ स मेघवर्णः अन्वयागतोज्जीवि-सञ्जीवि-अनुजीवि- प्रजीवि-चिरञ्जीविनाम्नः पंच सचिवान् प्रत्येकं प्रष्टुमारब्धः । तत्र एतेषामादौ तावदुज्जीविनं पृष्टवान्- "भद्र ! एवं स्थिते किं मन्यते भवान्'?' । स आह- "राजन् ! बलवता सह विग्रहो न कार्यः । यथा स बलवान् कालप्रहर्त्ता च । उक्तञ्च- यतः- तब वह मेघवर्ण वंशक्रमसे प्राप्त हुए उज्जीवि, संजीवि, अनुजीवि, प्रजीवि, और चिरंजीवि नामवाले पांच मंत्रियोंमें प्रत्येकसे पूछने लगा। तहां पहिले उज्जीविसे पूछा- " हे भद्र ! ऐसा उपस्थित होनेमे आप क्या मानते हो?" । वह बोला- “राजन् बलवानके साथ विग्रह करना उचित नहीं, क्यों कि वह बलवान् समय- पर प्रहार करता है । कहा है कि- बलीयसे प्रणमतां काले प्रहरतामपि । सम्षदो नापगच्छन्ति प्रतीपमिव सिन्धवः ॥ ७ ॥