पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२९१) बलवान् शत्रुको प्रणामसे सान्त्वना करनेवाले तथा समयपर प्रहार करनेवाले मनुष्योंकी सम्पत्ति निम्नवाहिनी नदीकी समान प्रतिकूल होकरभी नष्ट नहीं होतीहै ॥ ७ ॥ तथाच- तैसेही- सन्त्याज्यो धार्मिकश्चार्यो भ्रातृसंघातवान्बली । अनेकविजयी चैव सन्धेयः स रिपुर्भवेत् ॥ ८ ॥ धर्मात्मा श्रेष्ठ बहुत भाइयोंसे युक्त बली बहुतसे संग्रामका जीतनेवाला शत्रु त्यागना चाहिये अर्थात् उससे विग्रह न करे ॥ ८ ॥ सन्धिः कार्योऽप्यनार्येण विज्ञाय प्राणसंशयम् । प्राणैः संरक्षितैः सर्वं यतो भवति रक्षितम् ॥ ९ ॥ प्राणसंशय प्राप्त होनेपर अनाडीके साथभी संधि करना उचित है क्योंकि प्राणरक्षासे सबकी रक्षा होती है ॥ ९ ॥ येन अनेकयुद्धविजयी स तेन विशेषात् सन्दधनीयः । उक्तञ्च- जिससे कि वह अनेक युद्ध विजयी है इस कारण उससे संधि करलो । कहाहै कि- अनेकयुद्धविजयी सन्धानं यस्य गच्छति । तत्प्रभावेण तस्याशु वशं गच्छन्त्यरातयः ॥ १० ॥ अनेक युद्धविजयीकी जिससे संधि होजातीहै उसके प्रभावसे बहुतसे शत्रु उसके आधीन होजाते हैं ॥ १० ॥ सन्धिमिच्छेत्समेनापि सन्दिग्धो विजयो युधि । न हि सांशयिकं कुर्य्यादित्युवाच बृहस्पतिः ॥ ११ ॥ जो युद्धके विजयमें सन्देह हो तो समानसेभी संधि करले परन्तु संदिग्ध कार्य न करे ऐसा बृहस्पतिने कहा है ॥ ११ ॥ सन्दिग्धो विजयो युद्धे जनानामिह युध्यताम् । उपायत्रितयादूर्द्धं तस्माद्युद्धं समाचरेत् ॥ १२ ॥