पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २९२ ) पञ्चतन्त्रम् । युद्ध करनेवाले जनोंको युद्धमें संदेह रहता है इसकी योजना साम, दान, भेद तनि उपायोंके पश्चात्ही करे ॥ १२ ॥ असन्दधानो मानाद्यः समेनापि हतो भृशम् । आमकुम्भ इवान्येन करोत्युभयसंक्षयम् ॥ १३ ॥ जो अभिमानसे संधि न करके समानसे अत्यन्त ताडित होताहै, वह कच्चे घडेकी समान दोनों ( मान और प्राण ) सेही ध्वंस होताहै ॥ १३ ॥ समं शक्तिमता युद्धमशक्तस्य हि मृत्यवे । दृषत्कुम्भं यथा भित्त्वा तावत्तिष्ठति शक्तिमान् ॥ १४ ॥ समर्थके साथ दुर्बलको युद्ध मृत्युके लियेही होताहै शक्तिमान् पाषाण घटकी समान दुर्बलको तोडकर आप स्थित रहता है ॥ १४ ॥ अन्यच्च- औरभी- भूमिर्मित्रं हिरण्यं वा विग्रहस्य फलत्रयम् । नास्त्येकमपि यद्येषां विग्रहं न समाचरेत् ॥ १५ ॥ पृथ्वी मित्र वा सुवर्ण यह विग्रहके तीन फल हैं जो इनमेंसे एकभी न हो तो विग्रह न करे ॥ १५ ॥ खनन्नाखुबिलं सिंहः पाषाणशकलाकुलम् । प्राप्नोति नखभङ्गं वा फलं वा मूषको भवेत् ॥ १६ ॥ सिंह यदि पत्थरसे निर्मित चूहेकी बिल खोदे तो नख टूटनेको प्राप्त होता है वा मूषिक लाभका फल होता है ॥ १६ ॥ तस्मान्न स्यात्फलं यत्र दुष्टं युद्धन्तु केवलम् । न तत्स्वयं समुत्पाद्यं कर्त्तव्यं न कथञ्चन ॥ १७ ॥ इस कारण जहां कुछ फल नहो और केवल दुष्ट युद्धही हो तो उस कार्यको स्वयं उठाना उचित नहीं है ॥ १७ ॥ बलीयसा समाक्रान्तो वैतसीं वृत्तिमाचरेत् । वाञ्छन्नभ्रंशिनीं लक्ष्मीं न भौजङ्गीं कदाचन ॥ १८ ॥ बलवान्से आक्रान्त होनेमें वेतसम्बन्धी वृत्तिको अवलम्बन करे जो अक्षय लक्ष्मीकी इच्छा करे न कि सर्पकी समान चंचल ॥ १८ ॥