भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( २९३ ) कुर्वन् हि वैतसीं वृत्तिं प्राप्नोति महतीं श्रियम् । भुजङ्गवृत्तिमापन्नो वधमर्हति केवलम् ॥ १९ ॥ वैतसी वृत्तिको प्राप्त होकर बडी लक्ष्मीको प्राप्त होता है, भुजगवृत्तिको प्राप्त होकर केवल वधके योग्य होता है ॥ १९ ॥ कौर्मं संकोचमास्थाय प्रहारानपि मर्षयेत् । काले काले च मतिमानुत्तिष्ठेत्कृष्णसर्पवत् ॥ २० ॥ संकोचको प्राप्त होकर कूर्मवृत्तिके समान प्रहारोकोभी सहन करे समय २ पर कृष्ण सर्पकी समान बुद्धिमान् उठे ॥ २० ॥ आगतं विग्रहं मत्वा सुसाम्ना प्रशमं नयेत् । विजयस्य ह्यनित्यत्वाद्रभसञ्च समुत्सृजेत् ॥ २१ ॥ आये हुए विग्रहको देखकर बुद्धिमान् सामउपायसे शान्त करे विजयके अनित्य होनेमें वेग (युद्धके उद्योग) को त्याग दे ॥ २१ ॥ तथाच- तैसेही- वलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् । प्रतिवातं न हि घनः कदाचिदुपसर्पति ॥ २२ ॥” बलवान्के संग युद्ध करना चाहिये इसमें दृष्टान्त नहीं है कभी मेघ पवनके सामने नहीं आते हैं ॥ २२ ॥” एवमुज्जीवी साममन्त्रं सन्धिकारं कृतवान् । अथ तच्छ्रुत्वा सञ्जीवनमाह,-“भद्र ! तव अभिप्रायमपि श्रोतुमिच्छामि” । स आह,-“देव ! न मम एतत् प्रतिभाति यच्छत्रुणा सह सन्धिः क्रियते । उक्तञ्च यतः- इस प्रकार उज्जीवीने साममन्त्रसे सम्मति करनेको समर्थन किया । यह सुनकर सञ्जीवीसे बोला,-“भद्र ! तुम्हारे अभिप्रायके सुननेकी इच्छा करता हूँ” । वह बोला-“देव ! मुझे यह बात अच्छी नहीं लगती जो शत्रुके साथ संधि कीजावे । कारण कहा है- शत्रुना न हि सन्दध्यात्सुश्लिष्टेनापि सन्धिना । सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ २३ ॥

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