भारतकोश
पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 170 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १२७ वायुभूतास्तु गच्छन्ति तृषार्त्ताः सलिलार्थिनः ॥१२॥ जब ब्राह्मण लोग स्नान के लिए जाते हैं तो उनके पीछे-पीछे सभी देवता, पितर आदि वायु के रूप में अपनी तृषा-शान्ति के लिए चलते हैं ॥ १२ ॥ निराशास्ते निवर्त्तन्ते वस्त्रनिष्पीडने कृते । तस्मान्न पीडयेद् वस्त्रमकृत्वा पितृतर्पणम् ॥१३॥ स्नान के बाद वस्त्र निचोड़ने पर देव-पितृगणों की आशा निराशा में परिणत हो जाती है । इसलिए जब तक पितृतर्पण न कर ले तब तक गीले वस्त्र को निचोड़ना नहीं चाहिए ॥ १३ ॥ रोमकूपेष्ववस्थाप्य यस्तिलैस्तर्पयेत् पितॄन् । तर्पितास्तेन ते सर्वे रुधिरेण मलेन च ॥१४॥ जो मनुष्य अपने रोमकूपों पर तिल रखकर पितरों का तर्पण करता है तो ऐसा तर्पण रक्त और मल द्वारा किया जानेवाला तर्पण समझा जाता है ॥ १४ ॥ अवधूनोति च यः केशान् स्नात्वा प्रस्रवते द्विजः । आचामेद् वा जलस्थोऽपि स बाह्यः पितृ-दैवतैः ॥१५॥ स्नान के बाद अपने केशों को झटकारने, गीले कपड़े पहनकर लघुशंका करने और सूखे कपड़े से जल में खड़ा होकर आचमन करने- वाला ब्राह्मण देव-पितृ के कार्य के लिए अयोग्य होता है ॥ १५ ॥ शिरः प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छ-शिखोऽपि वा । विना यज्ञोपवीतेन आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ॥१६॥ शिर या गले में कपड़ा लपेट, धोती, लाँग या शिखा को खोल या यज्ञोपवीत से रहित होकर आचमन करने पर भी उस ब्राह्मण को शुद्धि नहीं मिलती ॥ १६ ॥ १. 'यस्तूतसृजेन्मलम्' इति । Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal